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Category: Historical Analysis
Tags: AssassinationGandhiHistoryIndiaPolitics
Entities: HindutvaIndian National CongressJawaharlal NehruMahatma GandhiNarayan ApteNathuram GodsePartition of IndiaPrakhar SrivastavaRashtriya Swayamsevak SanghSardar PatelVinayak Damodar Savarkar
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[संगीत] [संगीत] नमस्ते एंड वेलकम टू दिस एक्साइटिंग एपिसोड ऑफ सोलजी डीबंकिंग मिथल जीी सोलजी मीन साइंस ऑफ ट्रथ स्टडी ऑफ ट्रुथ अपोजिट
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ऑफ दैट इ मैथोलॉजी च मीन साइंस और स्टडी ऑफ फेक लाय इमेजिनेशन सो सोलजी एक्चुअली बिल्ड्स योर आइडेंटिटी एंड मैथोलॉजी एक्चुअली डिस्ट्रॉय योर आइडेंटिटी नाउ थैंक ल द व्यूवर्स फॉर लविंग माय बुक्स एंड इ बीन ए
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ग्रेट ऑनर टू रिसीव एन अवार्ड फ्रॉम एन अमेरिकन बुक सेलर टू बी द बेस्ट सेलिंग अमेरिकन ऑथर इन माय कैटेगरी नाउ इ दोस ऑफ यू र आस्किंग क्वेश्चंस अबाउट ट्रांडिंग द माइंड बुक इटस ए इट्स द
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ट्रांसलेशन ऑफ पतंजलि वर्क एंड आई थिंक प्रोबेबली द फर्स्ट टाइम सम बडी है डन फ्रॉम द कमेंट्री ऑफ भागवत पुराण एंड भगवत गीता पतंजलि वक सो आई वेरी स्पेशल गेस्ट टुडे आज हमारे साथ बड़े अच्छे अतिथि हैं
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ही इज ए न्यूज एंकर एंड ही ज बीन जर्नलिस्ट फॉर अ वेरी लॉन्ग टाइम ही इज अ सीनियर कंसल्टिंग एडिटर ऑफ डीडी न्यूज एंड एन एंड देन आई जस्ट रीड आउट एक्स टीवी इंडिया टीवी जी
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न्यूज आज तक एनडी टीवी न्यूज 24 मेनी मेनी न्यूज चैनल्स एंड इनका एक पुस्तक आया है हे राम एंड ट अराउस माय क्यूरियोसिटी टू वेरी लार्ज लेवल वेर आ मेरे को लग रहा था
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कि क्या लिखा होगा इन्होने महात्मा गांधी के बारे में जो हम लोगों को मालूम नहीं है या सोशल मीडिया यूनिवर्सिटी में जो फैला हुआ नहीं है बट इट इ लवेज गुड टू नो द फर्स्ट हैंड इंफॉर्मेशन और मैं भी इनसे बात कर रहा था अभी आएंगे हम लाइव होंगे तो
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तब बताया इन्होने इट कंटेंपरेरी व्यूज अबाउट महात्मा गांधी जो उस समय के जो लोग थे महात्मा गांधी के साथ उनके व्यूज के आधारित बुक है वेरी अथॉरिटेटिव विश्वसनीय आप बोल सकते हैं तो तो लेट अस वेलकम श्री प्रखर श्रीवास्तव
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वेलकम प्रखर जी नमस्कार धन्यवाद नमस्ते नमस्ते थैंक यू फॉर कमिंग ऑन द शो एंड आई लव सीरियस ऑथर्स लाइक व्ट यू आर डूइंग इज सेपरेटिंग फिक्शन फ्रॉम नॉन फिक्शन सो महात्मा गांधी के विषय में लोग जितना कम
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जानते हैं उतना शायद किसी भी पॉलिटिकल लीडर के बारे में उन देश के लोग इतना मतलब इतना ज्यादा जानना जिनको ज्यादा जानना चाहिए वो नहीं जानते महात्मा गांधी के बारे में तो मुझे एक बात बताइए ओवरऑल पूरी बुक में मैंने आपकी बुक के चैप्टर्स
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देखे तो आप महात्मा गांधी की पर्सनालिटी को कैसे सराइज करते हैं और एक चीज मैं ड कर दूं पूरे वेस्ट में महात्मा गांधी को ऐसा लीडर बताया जाता है कि कि ही इ वन ऑफ द ग्रेटेस्ट पीस आइकन ऑफ ल टा टाइम और
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दूसरा वेस्ट जिसको ग्लोरिफाई करता है इसका मतलब उस व्यक्ति ने वेस्ट के लिए काम किया है दिस इ द वे वेस्ट वर्क्स मैं बहुत सालों से इधर रह रहा हूं तो आई नो हाउ दे ग्लोरिफाई शूगो चावे हुगो चावे दे ग्लोरिफाई अ लट उसके नाम प सड़के बनी ई
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पूरे अमेरिका में तो सम र ही वास इवॉल्व तो व्हाट इज योर व्यू ऑफ द ओवरऑल पर्सनालिटी ऑफ महात्मा गांधी जो दर्शकों को पता लगे देखिए महात्मा गांधी की अगर पूरी व्यक्तित्व पर बात की जाए तो वो तो एक इतना बड़ा विषय है कि उस परे मलब ना
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जाने कितनी हजारों लाखों किताबें लिखी गई है कि शायद हम किताबों के ही नाम लेना शुरू करें तो हमारी बातचीत म जाने कब तक चलती रहेगी इसलिए जब मैंने गांधी जी पर ये पुस्तक लिखी तो गांधी जी पर ये पुस्तक जो मैंने लिखी है वो उनकी हत्या से जुड़े
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विषय पर मैंने पुस्तक लिखी कि जो गांधी जी की हत्या हुई जिसका आज भी बहुत बड़ा राजनीतिक इस्तेमाल होता है बारबार जो है हर तीसरे चौथे दिन कोई ना कोई भारतीय राजनीतिक दल जो है वो वो महात्मा गांधी की हत्या का जिक्र करता है उस पर लेकर राजनीति होती है तो मैंने गांधी का जो
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बहुत बड़ा जीवन है जिसम उनकी लंबी राजनीतिक यात्रा है जिसको जिस पर पूरी दुनिया में चर्चा होती है उसमें से मैंने उनके जो अंतिम दो वर्ष थे जो अंतिम साल थे उनके दो साल 1946 से लेकर उनकी मृत्यु तक 1948 तक के काल को लिया है और वो इसलिए
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लिया है कि वो महात्मा गांधी का सबसे विवादित जो हिस्सा है उनके जीवन का अगर आप मान सकते हैं तो वही अंतिम दो वर्ष है और उन दो वर्षों के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं क्यक जो विवाद हुए बातचीत करते हैं लेकिन वो विवाद की जड़ क्या थी उसके
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आसपास जो चीजें चल रही थी उसके विषय में बहुत कम चीजें मालूम है तो महात्मा गांधी की जो महान जीवन यात्रा है जिसमें उन्होंने पूरे आजादी के लिए पूरे भारतीय समाज को जागृत किया उस यात्रा उस हिस्से को ना लेकर मैंने अंतिम दो वर्ष का हिस्सा लिया क्यक वो अंतिम दो वर्ष का जो हिस्सा
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है जो उनके हत्या से जुड़ा हुआ है उसी दौर के अंदर जो है वो पाकिस्तान की मांग जोर पकड़ती है पाकिस्तान के तौर पर जो एक नए देश की मांग इतनी जोर पकड़ देती है कि उसका बनना तय हो जाता है उसके बाद हिंदू मुस्लिम दंगे पूरे सबकॉन्टिनेंट में होते
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हैं जिनका वो दंगे इस तरह के दंगे हैं कि जिसकी मिसाल शायद ही मानव जाति के इतिहास में क मिलती है इसके अलावा जो है वो महात्मा गांधी के उस दौर की जो नीतिया थी उसका पूरा एक बहुत बड़ा लेखा जो उस दौर के अंदर सामने आता है वो मैं पुस्तक में लिखा है इसके अलावा जो कांग्रेस की इंटरनल
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पॉलिटिक्स थी जहां पर नेहरू और पटेल के बीच में संघर्ष राजनीतिक चल रहा था और गांधी किस तरह से नेहरू को आगे करते जिसे पूरा भारत का जो आने वाला भविष्य है वो बदल जाता है तो ये जो क्रिटिकल टू इयर्स जो महात्मा गांधी के आखरी के थे इसको मैंने अपनी पुस्तक का आधार बनाया है
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क्योंकि गांधी का जो पूरा जीवन है जो उन्होंने राष्ट्र के लिए किया और जो जागृति की और जिनो जो उनका जो योगदान है पूरा मानवता में भारत की आजादी में लेकिन इसका ये कतई मतलब नहीं है कि जो महात्मा गांधी के जो जीवन की है जो उनकी नीतियां है उनके ऊपर हम निष्पक्ष होकर चर्चा नहीं
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कर पाते न दुर्भाग्य की बात है कि जब भी गांधी के जो अंतिम वर्षों का जब समय आता है तो मुझे लगता है कि जो भी लेखक रहे मैं किसी को यह नहीं कहता कि लोगों ने सही मायने में नहीं लिखा है या शायद उन्होंने निष्पक्षता नहीं भती हो लेकिन मुझे लगता है कि जो निष्पक्ष तरीके से गांधी के
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अंतिम दो वर्ष की जो उनके क्रियाकलाप थे जो उनकी नीतियां थी उसकी एक समालोचना होना चाहिए और यह पाठकों तक और इतिहास को जो समझना चाहते हैं अपने इतिहास को खासकर जो बहुत क्रिटिकल यर्स है ना केवल महात्मा गांधी के जीवन से जुड़े हुए बल्कि भारतीय
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इतिहास के भी सबसे क्रिटिकल इयर्स जो है वो 1946 1947 और 1948 है उन तीन साल में हो क्या रहा था इसको आधार बनाकर मैंने अपनी पुस्तक हेराम लिखी अभी रिसेंटली प्राइम मिनिस्टर मोदी ने एक स्पीच में बोला कि की गांधी परिवार
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में कोई नेहरू सरनेम नहीं है किसी का आजकल के गाधी परिवार है तो एक लोगों ने गांधी जी का नाम यूज भी किया है बहुत ज्यादा अपने बेनिफिट के तो तो आपको वो उसका क्या रीजन लगता है आपने जो रिसर्च किया है उसम
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क्यों इतना नाम उनका यूज क्या किया जाता है देखिए उनके नाम को अगर मैं कहूं तो उनके नाम से ज्यादा जो मेरी पुस्तक का विषय उस पर आऊ तो मैं आपको ये बताना चाहूंगा कि ना केवल उनके नाम का इस्तेमाल किया गया बल्कि महात्मा गांधी की हत्या का भी
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इस्तेमाल किया गया और वो हत्या का जो इस्तेमाल राजनीतिक इस्तेमाल होता है वो लगातार 75 साल से चला आ रहा है मैं आपको एक बात बताऊ कि भारतीय राजनीति में बहुत मशहूर जुमला है वो जुमला ये है कि किसी की चिता पर राजनीति की रोटियां सीखना तो मैं
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बहुत जिम्मेदारी से ये बात कहना चाहता हूं कि अगर भारतीय राजनीति में किसी व्यक्ति की चिता पर राजनीति की रोटियां सेकी गई है तो वो महात्मा गांधी है और उनकी हत्या के अगले दिन सेय कार्य शुरू हो गया था और ये कार्य जवाहरलाल नेहरू ने किया तो महात्मा
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गांधी के ना केवल विरासत का लोगों ने यहां प दोहन किया है भारतीय राजनीति में बल्कि उनकी मृत्यु तक को नहीं छोड़ा जो उनकी हत्या हुई उसका राजनीतिक इस्तेमाल किया गया मैं आपको थोड़ा स्पष्ट कर देता हूं कि महात्मा गांधी की जो हत्या हुई उसका कैसे राजनीतिक इस्तेमाल भारत के नेताओं ने किया
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खासकर कांग्रेस और कांग्रेस में भी पंडित जवाहरलाल नेहरू ने किस तरह से उनका इस्तेमाल किया तो वो मैं आपको आपको बताऊं कि महात्मा गांधी की जब हत्या होती है तो एक बहुत बड़े भारत के नेता हुए एनवी गाडगिल ने उन्होंने ये बात कही थी कि गोसे ने जो तीन
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गोलियां चलाई थी गांधी पर उसमें से पहली गोली उसने गांधी पर चलाई दूसरी गोली उसने चितपावन ब्राह्मणों पर चलाई जिनका पूरा उसके बाद नर संगारेड्डी
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यह था कि गांधी की हत्या की जो वजह है वो हिंदुत्व की विचारधारा की वजह से व हत्या हुई है गांधी की हत्या करने वाले हिंदुत्व की विचारधारा को मानते थे ये बात सत्य है कि गांधी की हत्या करने वाले जो लोग थे नाथुराम गो साथी वो हिंदुत्व की विचारधारा को मानते थे लेकिन गांधी की हत्या की वजह
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हिंदुत्व की विचारधारा नहीं है गांधी की हत्या की वजह तीन वजह है पहली वजह उनकी मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति दूसरी वजह है उनका जो जो रिफ्यूजी आए थे पाकिस्तान से हिंदू श उनके प्रति उनका खा व था और तीसरी वजह जो है वो यह है कि जो पाकिस्तान को 55
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करोड़ रुपए देने की उन्होंने मांग की थी तो इसके इर्दगिर्द महात्मा की गांधी की हत्या की हत्या वजह बनती है लेकिन महात्मा गांधी के नाम का इस्तेमाल उनके हत्या का इस्तेमाल जो है वो हिंदुत्व की आइडल जीी को पीछे धकेलने के लिए किया गया जैसे गांधी की हत्या होती है
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तो उन संगठनों पर प्रतिबंध लगा दिया जाता है जिनका कोई महात्मा गांधी की हत्या से लेना देना नहीं था उदाहरण के तौर पर आरएसएस पर नेहरू सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया की उसके बात हुई सारी जांच में और उसके बाद जितनी लोगों ने अध्ययन किया रिसर्च किया यहां तक कि जो कपूर कमीशन भी
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आता है वो भी ये मानता है कि आरएसएस का इस हत्याकांड में कोई भी हाथ नहीं था लेकिन फिर भी महात्मा गांधी की हत्या का एक तरह से राजनीतिक लाभ उठाकर संघ को कुचलने के लिए आरएसएस को कुचलने के लिए नेहरू ने इस्तेमाल किया तो उसके बाद नेहरू ही रुके उसका चाहे इंदिरा गांधी हो चाहे राजीव
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गांधी हो चाहे वो वर्तमान जो गांधी नाम अपने आगे अपने पीछे लगा और गांधी के साथ खुद को जोड़ने की कोशिश करते हैं वो आज तक महात्मा गांधी की हत्या का इस्तेमाल जो है वो हिंदुत्व को बदनाम करने के लिए हिंदु की आडलज या उन संगठनों पर वो
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हमले करते हैं गांधी का नाम लेकर जिनका हत्याकांड से कोई लेना देना नहीं था तो ये जो आप जो बात कह रहे हैं कि गांधी के नाम का इस्तेमाल तो ये लोग ना सिर्फ गांधी के नाम का इस्तेमाल भारतीय राजनीति में इन लोगों ने किया अपने नाम के आगे लगाकर बल्कि गांधी की हत्या जैसी दुखद घटना का
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भी इस्तेमाल अपने राजनीतिक लाभ के लिए पीढ़ी दर पीढ़ी ये करते चले आ रहे हैं और जो काम इन्होंने 1948 में शुरू किया था गांधी की हत्या के अगले दिन 31 जनवरी 1948 से लेकर वो 2023 प भी जारी है और 2024 के चुनाव में भी आप देख लीजिएगा कि ये सब
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चर्चा इस तरह के बयान आते रहेंगे जी अगर रिचर्ड एटली का हम स्टेटमेंट देखें कि भारत की आजादी जो है सुभाष चंद्र बोस मतलब किसी ने उनको पूछा कि महात्मा गांधी से मिली है उन्होंने कोलकाता में ही बोला उन्होंने
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कि नहीं मिनिमम कोई कंट्रीब्यूशन नहीं है ये ब्रिटिश का और अगर हम विंस्टन चर्चिल और इन लोगों का व्यूज देखें तो एंटी गांधी व्यूज है सबका और और बट इफ यू सी इंडिया तो एक एक तरीके का क्लियर षडयंत्र दिखता
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है कि महात्मा गांधी किसके फेवर में थे या किसके साथ थे एक क्वेश्चन एक आपकी बुक में आपने लिखा हुआ है कि शायद लोग ऐसे नारे भी लगाते थे मरना है तो मरने दो गांधी को मरने दो ये इस तरह के नारे उस सम में क्या इसके विषय में आपको क्या बोलना है कि ये
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क्या किस देखिए मैं आपको जो बता रहा हूं ना कि मैंने जो अने आपने पहला सवाल पूछा था मैंने जो कहा कि गांधी के जो अंतिम दो वर्ष थे वो बड़े ही क्रिटिकल माने जाते हैं भारतीय पॉलिटिक्स में भी भारत के इतिहास में भी और गांधी के जीवन में भी
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गांधी का जो जीवन में उनकी लोकप्रियता का ग्राफ था कि वो एक बार जब आवाज उठाते थे तो पूरा देश उनके लिए उनके उनकी आवाज पर उठ खड़ा होता था और गांधी जब कोई आंदोलन छेड़ते थे तो करोड़ों लोग लाख लोग जो है उनके पीछे चल पड़ते थे तो ये गांधी का पूरा लोकप्रियता का ग्राफ था कि भारतीय
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राजनीति को डोमिनेट डोमिनेट करते थे लेकिन उनके जो अंतिम दो वर्ष थे खासकर 1946 के बाद जब पाकिस्तान की मांग तेज तेजी पकड़ती है कैबिनेट मिशन आता है और कलकत्ता के अंदर 16 अगस्त 1946 को जब डायरेक्ट एक्शन डे होता हैम हिंदुओ का अंगार होता है फिर
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उसी प्रक्रिया को जो है नकली में दोहराया जाता है फ वो हिंसा का दौर बिहार से होता हुआ पंजाब और एन डब्लू एफपी जो प्रांत है पाकिस्तान का जिसको आज उनका बॉर्डर अफगानिस्तान से लगा इलाका है पेशावर वगैरह वहां पर जब दंगों का पूरी
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एक सीरीज चलती है तो गांधी की जो लोकप्रियता का जो ग्राफ था वो उनके अंतिम दिनों तक आते आते बहुत ही निचले स्तर पर चला जाता जा रहा था और उसकी वजह थी गांधी की नीतिया जैसा कि मैंने जिक्र किया है कि लोगों का जो गांधी के प्रति से जो गांधी
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से जो उम्मीदें थी उनको पहली उम्मीद थी कि गांधी जो है बटवारे को विभाजन को रोकने में कामयाब हो जाएंगे क्योंकि गांधी ने अपने पूरे जीवन में कहा हमको बचपन से पढ़ाया गया कि पाकिस्तान मेरी लाश पर बनेगा या पाकिस्तान बनाने से पहले मेरे शरीर के दो टुकड़े कर दो लेकिन हम देखते
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हैं कि राजनीतिक जुमले से ज्यादा कभी भी ये गांधी इसको साबित करके नहीं दिखा पाए गांधी तमाम विरोध की बातें करते रहे लेकिन जिन मौकों पर वो विभाजन को रोक सकते थे पार्टीशन को रोक सकते थे वहां पर वो सफल नहीं हुए या शायद वो सफल होना भी नहीं
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चाहते थे क्योंकि उन्होंने एक तरह से बटवारे को सहमति दे दी तो जो आम हिंदू सिख शरणार्थी सिख जो थे जो पाकिस्तान के इलाको में रहते थे उनको य उम्मीद थी कि किसी भी तरह से गांधी जी जो है वो इस बटवारे को रोक लेंगे और हमें विश का नहीं झेलनी पड़ेगी लेकिन गांधी जी इसम नाकाम रहे तो
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गांधी जी के अलोकपट दिनों में जो लोकप्रिय हो रहे थे मैं आपके सवाल के जवाब में आ रहा हूं जो आपने कहा कि गांधी के मरने के लिए जो नारे लगाए जाते उसकी भूमिका कैसे तैयार हो रही थी तो गांधी विभाजन रोकने में नाकाम रहे गांधी का जो अहिंसा का सिद्धांत जो लगातार 30 40 साल से जो
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अहिंसा की जो बातें करते थे चाहे उन्होने दक्षिण अफ्रीका में की हो चाहे भारत में की हो और अहिंसा कां की जो बात करते थे अहिंसा की जो बात करते थे वो अहिंसा पूरी तरह से नाकाम नजर आई जब दंगों का एक दौर शुरू होता है और हिंदू मुसलमान एक दूसरे के खून के प्यासे हो जाते हैं और लाखों लाख लाखों लाख लाशें गिरती है मतलब जो लोग
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कहते हैं ना अहिंसा से देश को आजादी मिली दे दी हमें आजादी बिना खटक बिना ढाल साबरमती के संत तने कर दिया कमाल तो ये एक कविता के तौर पर अच्छा लग सकता है गीत के तौर पर अच्छा लग सकता है लेकिन प्रैक्टिकल नजरी आप देखते तो शायद दुनिया में कोई ऐसा
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देश होगा जिसे 20 30 40 लाखों लाख लाशों के ऊपर आजादी मिली होगी तो भारत की आजादी जो है वो अगर कोई कहता है कि अहिंसा से हासिल हुई है या अहिंसा ने हमको आजादी दे दी तो इस आजादी की कीमत अगर एक आकड़ा कहता
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है कि 20 लाख लोग मरे कोई कहता 30 कहता है कोई 40 कहता है कोई 50 कहता है कोई भी आंकड़ा कम नहीं है तो यह जो अहिंसा का सिद्धांत य खोला साबित हो गया 1946 तक आते आते फिर जो लोगों को उम्मीद थी कि जो पाकिस्तान बना था वो पाकिस्तान मांगने
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वाले हिंदू नहीं थे चाहे वो भारत में रहने वाले हिंदू हो चाहे वो पाकिस्तान के हिस्से में रहने वाले हिंदू हो किसी ने पाकिस्तान नहीं मांगा पाकिस्तान मांगने वाले थे इस देश के मुसलमान पाकिस्तान मांगने वालों में सबसे ज्यादा जो ताकत थी जो फोर्स जो पाकिस्तान को मांग रहा था वो
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कोई सिंध के मुसलमान नहीं थे व एन डब्ल्यूएफपी के मुसलमान नहीं थे बलूचिस्तान के मुस मुसलमान नहीं थे वो कोई पाकिस्तानी पंजाब के मुसलमान नहीं थे असल में पाकिस्तान की मांग को जो खाद पानी मिली और पाकिस्तान मूवमेंट जो पूरा चलता
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है पाकिस्तान की मांग का वो वर्तमान उत्तर प्रदेश जिसको उस वक्त यूनाइटेड प्रोविंस कहा जाता था वहां से चलता है तो पाकिस्तान मांगने वाले लोग कौन थे उत्तर प्रदेश के मुसलमान थे आप देख लीजिए मुस्लिम लीग के जितने बड़े नेता थे वो कहां के थे यूनाइटेड प्रोविंस के थे खुद मोहम्मद अली
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जिन्ना जो थे वो कोई लाहौर कराची पेशावर के थ वो मुंबई के रहने वाले थे गुजरात के रहने वाले थे उनके तो पूरा हिसा जो है उनके जो उनका जो पु इलाका तो भारत में रह गया उनका जो कर्म क्षेत्र मुंबई था व भारत में रह गया तो पाकिस्तान की जो मांग कर
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रहे थे तो पाकिस्तान की मांग करने वाले लोग जो थे भारतीय क्षेत्रों के मुसलमान थे य और बात है कि पाकिस्तान बनने के बाद कभी पाकिस्तान नहीं वंशज आज भी भारत में रहते हैं तो इसके बाद भी जब भारत का बटवारा
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होता है तो गांधी की जो नीतिया थी वो मुस्लिम अपीज मेंट की जो नीति थी वो लोगों को बहुत चुभी क्योंकि गांधी हर समय जो उस वक्त मुस्लिम अपीज मेंट उनकी हद से हद बढ़ता जा रहा था उसकी वजह से उनकी लोकप्रियता समाप्त हुई और इस प्रकार से जो
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शियों के प्रति महात्मा गांधी का रूखा व्यवहार था मैं आपको किस्से बताऊ तो ऐसे कई भाषण मैंने उनके उस वक्त अंतिम समय के जो अध्ययन किया अपनी पुस्तक लिखने के दौरान तो उनके भाषणों के अंदर जो रिफ्यूजी जो पाकिस्तान से आए थे हिंदू सख उनके प्रति जो उनका व्यवहार था बड़ा रूखा नजर
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आता था फॉर एग्जांपल उन्होंने भाषणों के अंदर वो कहते थे कि जब से ये हिंदू और सिख शरणार्थी दिल्ली में आए तब से दिल्ली में शराब की बिकरी बढ़ गई है वो इस बात पर टोक थे रिफ्यूजीस को कि आप लोग जो है वो हर जब किराना लेने के लिए जाते हैं राशन का सामान लेने जाते हैं तो दुकानदारों से मोल
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भाव करते हैं आप तांगे वालों से मोल भाव करते हैं वो सिखों पर आरोप लगाते थे कि सिख लोग जो खुली तलवार लेकर घूमते हैं जैसे दिल्ली का माहौल बिगड़ रहा है तो यहां तक कि एक बार उन्होंने ये तक कह दिया इतना छोटा और इतना घटिया आरोप शरणार्थियों पर लगा दिया की बलावन में गांधी सभाए करते
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नी प्रार्थना सभा की व बिला सेठ की गठी थी वो बला भाई की तो उसम रहते थे तो बला भवन के अंदर फलो के पेड़ लगे होते थे तो शरणार्थी भी उनको सुनने आते थे कुछ इक्का दुक्का तो गांधी ने अपनी प्रार्थना सभा में कहा कि आप जब मुझे सुनने के लिए आते
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हैं तो बलावन में जो फलों के पड़ लगे फल चुरा लेते तो जो लोग अपने कोठिया लाहौर पेशावर में लोग अपनी कोठिया छोड़कर आए थे वो क्या बलान के फल चुराते थे तो इस तरह के जो वो आरोप लगाते थे या इस तरह की जो बातें करते थे साथ में मुस्लिम अपीज मेंट
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करते थे उनका कहना था कि जो मुसलमानों के घर खाली हो गए जो कुछ मुसलमान पाकिस्तान चले गए थे दिल्ली के तो उनके घर जो खाली हो गए वो हिंदू शरणार्थियों को ना दिए जाए जबकि ये गवर्नमेंट के बीच में डील थी दोनों सरकारों के बीच में भारत पाकिस्तान की कि जो जो जिस जिस इलाके में जो घर खाली हुए हैं वो शरणार्थियों को द दे दिए जाए
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जैसे उदाहरण के लिए अगर लाहौर से जो हिंदुओं ने जो प्रॉपर्टीज खाली की थी वहां पर यहां से जाने वाले मुसलमानों को बसा दिया गया और जो भारत में मुस्लिम घर खाली थे वहां पर उसी तरह से हिंदुओं और सिखों को बसाया जाना चाहिए था लेकिन गांधी इसका विरोध करते थे वो कहते थे घर खाली पड़े पड़े रहने दो लेकिन यहां पर किसी को हिंदू
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हिंदुओं को मत बसाओ जो पाकिस्तान से आए हैं और हिंदू किस स्थिति में हिंदू शरणार्थी और सिख शरणार्थी रह रहे थे दिल्ली में टेंटो में और मैं आपको बता दूं कि जो 1947 और 48 की जो ठंड पड़ी थी दिल्ली में मतलब वैसी ठंड ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए थे और ठंड ही नहीं पड़ रही थी
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साथ में उस बरसात भी हो रही थी उस नवंबर दिसंबर जनवरी के महीने में तो जो दिल्ली में रहता है वो जानता है कि जब दिल्ली में ठंड पड़ती है बेतहाशा और उसके साथ जब बारिश होती है तो खुले में रहना मल आप 20 2 मिनट से ज्यादा खड़े नहीं हो सकते हैं और ऐसे में शरणार्थियों को टेंटो में रहना
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पड़ रहा था लेकिन उनको खाली घर जो मुसलमानों के पड़े हुए थे वो नहीं दिए जा रहे थे यहां तक कि कुछ मुस्लिम इलाको में जो मस्जिदें खाली पड़ गई तो उस खाली पड़ी थी उसमें जब हिंदू शरणार्थी अंदर चले गए तो महात्मा गांधी ने सरकार पर दबाव डलवा करर उनसे मजदूरों उन मस्जिदों से हिंदू और
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सिख शरणार्थियों को खींच खींच कर भरी अ ठंडी और बरसाती रातों के अंदर बाहर खींच खींच कर निकाला गया और ये डॉक्यूमेंट मिलते हैं एविडेंस मिलते हैं तो इससे महात्मा गांधी की छवि दिन पर दिन खराब होती जा रही थी फिर हम आते हैं उस नारे पर जिसका जिक्र आपने किया है कि बिरला वहन के
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बाद जनवरी में जब गांधी अंतिम अंचन कर रहे थे अपने जीवन का वो अंतिम अंच का जो हिडन एजेंडा था गांधी का वो बुनियादी तौर पर पाकिस्तान को 5 करोड़ रुपए देने के लिए था और ये पूरे डॉक्युमेंटेड चीजें इससे साबित होता है कि गांधी ने 55 ठीक है उनके
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समर्थक के कहने की कोशिश करते हैं कि दिल्ली में शांति स्थापित करने के लिए हिंदू मुस्लिम एकता स्थापित करने के लिए उन्होने अशन किया था लेकिन इससे बड़ा कोई सफेद छूट हो नहीं सकता उस समय कोई दिल्ली में जनवरी 1948 में कोई ऐसे दंगे नहीं हो रहे थे कि गांधी को अपना अंच करना पड़े
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मुद्दा सिर्फ और सिर्फ एक था यह मैंने पूरा रिसर्च के साथ अपनी पुस्तक में लिखा है सिर्फ और सिर्फ 55 करोड़ रुप देने के लिए पाकिस्तान को गांधी ने अपने आखरी अशन किया था तो जब य गांधी ने अपना आ अशन किया तो इसके बाद स्थितियां इतनी गांधी के
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अगेंस्ट हो गई कि बिड़ला भवन के बाहर रातों में हिंदू सिख शरणार्थी खड़े हो जाते थे और यह नारे लगाते थे गांधी अंदर अशन कर रहे नारे लगाते थे कि मरता है तो मरने दो गांधी को मर जाने दो तो ऐसे एक दिन जब शरणार्थी नारे लगा रहे थे और नेहरू
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जी गांधी जी से मिलकर बाहर निकल रहे थे तो उन्होंने नारे सुने तो वो गाड़ी रुकवा उन्होने अपनी भीड़ के अंदर व चले गए और उन्होंने हाटा पाई शुरू कर दी शरणार्थी से कहा कि किसने कहा कि मरता है तो मरने दो गांधी को ने तो बोला उससे पहले मुझे तुम
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मारो तो इस तरह की कई एविडेंस मिलते हैं जो डोमिनिक लापर और लेरी कॉलिंस अपनी बुक लिखी है फ्रीडम एट मिडनाइट उसम उन्होंने लिखा है कि जब गांधी अपना आखरी अनशन कर रहे थे तो दिल्ली के बाजारों में यह चर्चा नहीं होती थी कि गांधी गांधी के गांधी का
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अनशन कब खत्म होगा बल्कि लोग ये चर्चा करते थे कि गांधी मरेंगे कब ये मैंने नहीं लिखा है ये उस वक्त के जो जिन्होने रिसर्च की वो उस दौर में लिखते हैं तो गांधी के बाहर उस समय मार्केट बुक बाइट थी बहुत बड़ी लाइफ मैगजीन की वो रिपोर्टर थी और
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सेकंड वर्ल्ड वर उन्होंने कवर किया था और उनसे बड़ा रिपोर्टर उस वक्त दुनिया में किने चुन माने जाते थे मार्ग बकट खुद उस वक्त भारत में मौजूद थ उ सारी इवेंट को वो कवर कर रही थी तो मार्ग्रेट बुक पाइट ने अपनी पुस्तक के अंदर ये लिखा है कि गांधी को लेकर असंतोष किस कदर बढ़ गया था मब वो
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टैक्सी के अंदर बैठती थी तो टैक्सी ड्राइवर गांधी के मरने की बात करता था वो मजदूरों की बस्ती में जाती थी तो मजदूर गांधी के लिए गलत बातें करते थे वो दिल्ली के बाजारों में जाती दिल्ली के बाजार में गांधी के मरने की बात होती थी विलन के बार दिल्ली गांधी के मरने की बात होती थी तो
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मैं बहुत रिसर्च के साथ यह बात मैंने अपनी पुस्तक में लिखी और बहुत ही जिम्मेदारी के साथ मैं इस आपके मंच पर भीय बात बोलना चाहता हूं कि जब 30 जनवरी 1948 की शाम 5 ब मिट पर नाथूराम गोसे ने गांधी को जब तीन
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गोलिया मारी थी तो उसके ठीक एक मिनट पहले यानी कि 30 जनवरी 198 की शाम 5 ब 16 मिट पर जो गांधी की लोकप्रियता का जो ग्राफ था वो उनके जीवन के पूरे जीवन में सबसे निचले
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स्तर पर था मैं ये नहीं कहता कि गांधी लोकप्रिय नहीं थे लेकिन जो गांधी की लोक लोकप्रियता से गांधी की लोकप्रियता को अगर कंपेयर किया जाए तो गांधी अपने अंतिम मिनट में जब मृत्यु की तरफ वो प्रवेश कर रहे थे तो उनकी लोकप्रियता का स्तर सबसे निचले
23:24
स्तर पर इसीलिए गांधी के खिलाफ इस तरह के नारे ल थे और लोगों का गांधी की अहिंसा और गांधीवाद से मोहभंग होने लगा जी आपने आपने जो बुक में आपके चैप्टर्स
23:40
मैं दर्शकों को बोलूंगा कि ये तो ऑलरेडी बेस्ट सर बुक है इंडिया में तीसरा प्रिंट के लिए जा रही है हे राम इनकी पुस्तक है प्रिंट के लिए जा रही पांचवा एडिशन इसका पांचवा एडिशन प्रिंट हो रहा है और थैंक यू फॉर करेक्टिंग और इसमें आपने बड़े अच्छे
23:55
टाइटल दिए हैं गांधी की आखिरी प्रयोगशाला एक चैप्टर टाइटल है और उस आखिरी प्रयोगशाला में मतलब व्हाट इज दैट व्हाट वाज द प्रयोगशाला व्ट इज एक्सपेरिमेंट ऑफ गांधी नहीं वो प्रयोगशाला इसलिए वो लिखा है मैंने उसको कि गांधी जब कल सभी बहुत कम
24:14
लोग ये जानते हैं कक कई लोग गलत फहमी कि आजादी के नखली में तो नखली में नहीं जब भारत आजाद हुआ था तो उस वक्त गांधी जी कलकाता में थे जिसको आज कोलकाता कहा जाता है तो कोलकाता के अंदर वो पहुंच गए थे अपने अगस्त सेकंड वीक में और आजादी जब भारत को मिली 15 अगस्त को तो उस रात वो
24:30
कोलकाता में थे उसी बाद कोलकाता में दो तीन दिन तो शांति र उसके कोलकाता के अंदर दंगे शुरू हो गए क्योंकि पिछली बार ज दंगे हुए थे तो उसमें मुसलमानों ने दंगे शुरू किए थे हिंदुओं का रंगारी अब कांग्रेस का शाशन आ गया था और मुस्लिम लीग की सरकार चली गई थी भारत का बटवारा हो गया तो कलकाता में दंगे शुरू हो
24:47
जाते हैं तो जिसमें हिंदू हावी पड़ रहे थे उन दंगों के अंदर तो गांधी वहां पर कोलकाता के दंगे रोकने के लिए वहां पर एक अंचन करते हैं जो मुझे लगता है तीन चार दिन चला था और वो मुसलमानों की रक्षा के लिए वहां पर एक अंचन करते हैं तो गांधी जब वहां पर अपने अंचन करते हैं तो उसका असर
25:04
होता है कोलकाता में हिंदू मुस्लिम दंगे जो रहे होते हैं वो रुक जाते हैं तो ऐसे में माउंट बेटन उनको कहते हैं गांधी को कि उस वक्त पंजाब में बहुत दंगे हो रहे थे कलकता में द जो हुए वो हुए लेकिन पंजाब में सबसे ज्यादा मार काट हो रही थी दोनों हिस्सों में चाहे वो पाकिस्तान के हिस्से का पंजाब हो चाहे भारत के हिस्से का पंजाब
25:20
हो तो माउन बटन ने एक बयान देकर कहा था कि जो हमारी बाउंडी फोर्स उन्होंने बनाई थी सेना की कि जो हम 4 हज सैनिकों की बाउंड्री फोर्स जो दंगे रोकने का काम पंजाब में नहीं कर पाई वो काम सिर्फ इकलौते महात्मा गांधी ने गांधी ने अकेले
25:37
की दम पर कलकाता के अंदर कर कर दिखाया मब कलकाता में मिरेकल कहा गया जिस तरह से गांधी ने वहा पर दंगे रोक दिए थे तो गांधी इस बयान से बड़े प्रभावित हुए माउंट बटन के इस बयान से और उन्होंने घोषणा करी कि अ वो कलकाता में चक दंगे रुक गए इसलिए वो दंगे रोकने के लिए जो है अब पंजाब जाएंगे
25:54
और पंजाब की सांप्रदायिक आग लगी हुई उसको बुझाने का काम काम करेंगे लेकिन कोलकाता और पंजाब के बीच में दिल्ली पड़ती थी तो गांधी कोलकाता से दिल्ली पहुंचे तब तक दिल्ली के अंदर दंगे भड़क तो गांधी ने अपना पंजाब जाने का प्लान कैंसिल करके
26:09
दिल्ली में रुकने का फैसला किया तो इसलिए मैंने जो दिल्ली में और दिल्ली में जब वो रुके तो फिर वो उसके बाद कहीं बाहर नहीं गए और दिल्ली उनका अंतिम स्थल साबित हुआ और सितंबर में जब वो फर्स्ट वीक सितंबर में जब दिल्ली आते हैं और 30 जनवरी जब उनका उनकी हत्या होती है तब तक वो दिल्ली
26:25
के अंदर ही रहते हैं और दिल्ली में वो जो कार्य करते हैं वो पूरी पुस्तक है तो इसलिए मैंने उसको आखरी प्रयोगशाला नाम दिया है और उसकी वजह मैं आपको बताता हूं कि दिल्ली के अंदर जो गांधी रुके तो दिल्ली में दंगे हुए इसमें कोई शक नहीं है सितंबर के अगस्त के लास्ट वीक से दंगा
26:41
शुरू हुआ था सितंबर फर्स्ट वीक तक वो दंगा बहुत बढ़ गया था सेकंड थर्ड वीक तक भी दंगा बहुत तूफान पर था लेकिन गांधी को जिस तरह के दंगों के बारे में बताया गया दिल्ली में असल में खुद जो सरदार पटेल के पर्सनल सेक्रेटरी
26:56
रहे वी शंकर जो इंडियन सिविल सर्विसेस के अधिकारी थे आईसीएस अधिकारी थे उन्होंने अपनी पुस्तक लिखी उसमें लिखा है और ऐसे कई यहां तक कि आचार्य कप्तानी भी अपनी पुस्तक में लिखकर गए हैं इसके अलावा कई बड़े उस दौर के पत्रकारों ने नेताओं ने लिखा है कि मौलाना आजाद के नेतृत्व में उस वक्त का जो
27:15
मुस्लिम नेताओं का एक जो पूरा एक ग्रुप था जो दिल्ली के अंदर एक तरह से मुस्लिमों का नेतृत्व करता था उन्होंने मौलाना आजाद के नेतृत्व में गांधी के पास जा जा के इस तरह का माहौल बना दिया कि दिल्ली के दंगों के अंदर ना जाने कितने मुसलमान मारे जा रहे हैं तो गांधी के मन में ये बात बैठ गई कि
27:31
दिल्ली में मुसलमान सुरक्षित नहीं है और ये बात मैं नहीं कह रहा मतलब मैंने आपको इतने नाम बताए शंकर का नाम बताया आचार कल्पनी की मानता प कोई शक नहीं कर सकता इतने बड़े गांधीवादी नेता थे कांग्रेस के अध्यक्ष रहे नेहरू जी के समकालीन थे तो वो तक लिखते हैं कि दिल्ली के मौलानाओं ने अपनी आदत बना ली थी कि रोज सुबह बलावन
27:48
पहुंच जाते थे और यही बात जो महात्मा गांधी के पर्सनल सेक्रेटरी थे प्यारेलाल यर जी उन्होंने जो अपनी पुस्तक लिखी है महात्मा गांधी पूर्ण हती उसमें भी बात लिखते कि दिल्ली के मौलानाओं का रोज का काम था कि गांधी के पास आ जाते थे और उनको य भरना शुरू कर देते थे कि भाई दिल्ली का
28:04
मुसलमान सुरक्षित नहीं है तो इस प्रकार गांधी दिल्ली में रुक गए तथाकथित मुसन मुसलमानों को सुरक्षा देने के लिए मुसलमान असुरक्षित है ऐसा नहीं था दंगे दोनों तरफ से बराबरी से हो रहे थे उसम हिंदू भी पीड़ित थे ले और मुसलमान भी पीड़ित थे लेकिन गांधी का पूरा य कहना था मुसलमान
28:20
पीड़ित है जैसा कि मौलाना आजाद और साथ मुसलमान नेताओ नेनको भर दिया था तो दिल्ली में रहकर उन्होने किया वो उनकी आ प्रयोगशाला थी इसलिए मैंने उसका नाम उस चैप्टर का नाम गांधी की आखरी प्रयोगशाला रखा है और इसी दिल्ली में रहने के दौरान पिछले सवाल में आपको जवाब दिया जो बयान
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देते थे जिस तरह की बातें कर रहे थे फिर जो आखरी अशन दिल्ली में किया तो उन्होने एक तरह से दिल्ली को अपनी प्रयोगशाला बना लिया आपने एक इतने अट्रैक्टिव नेम्स है सारे चैप्टर्स के तो कांग्रेचुलेशन फ थिंकिंग एंड
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राइटिंग वो इसकी वजह इसलिए है आपको नाम इस अच्छे लग रहे देखिए मैं टीवी पत्रकार हूं तो टीवी पत्रकार जो भी होता है 20 साल टीवी पत्रकारिता किए तो उसको कैची नाम देने की उसका प्रोफेशन होता है तो हम जब भी शो बनाते हैं आधे घंटे का तो हम चाहते हैं कि बड़ा अच्छा सा नाम हो तो वो
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प्रोफेशन है तोब पुस्तक लिखी तो नाम भी वसे चैप्टर के दे दिए बट वेरी अट्रैक्टिव चैप्टर नेम और सब कुछ क्लियर है लाइक यू नीड द चैप्टर नेम एंड यू नो व्ट इज गोइंग टू बी द कंटेंट क्या रहेगा स्पेसिफिक रहेगा एक आपने बड़ा अच्छा मुझे तो यह नाम
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ही पता नहीं है और इतने सालों से इंडिया से बाहर रह रहा हूं तो इसलिए थोड़ा डिस्कनेक्ट भी रहता है कभी-कभी तो आपने एक चैप्टर का नाम दिया रामचंद्र से नाथुराम तक और फिर उसके बाद मिस्टर ए मिसेस आपटे और गोट से तो यह संबंध क्या था मैनेजर
29:40
आपटे का और गोट से का क्या संबंध था और ये जो आपने रामचंद्र से नाथुराम गस नाथुराम बोस थुराम त गोट तक आपने लिखा तो क्या इसमें क्या संबंध है तीनों एक साथ ही चैप्टर है किस क्या संबंध
29:56
हैय देखिए ये जो मेरी पुस्तक है हे राम गांधी हत्याकांड की प्रमाणिक पड़ताल तो ये दो पार्ट में दोनों पार्ट एक ही एडिशन में एक ही बुक में तो पहला जो हिस्सा है उसका नाम है गांधी मृत्यु की ओ तो उसम मैं उन स्थितियों की चर्चा कर रहा हूं एविडेंस के साथ कि गांधी अपने अंतिम समय में अपनी
30:12
मृत्यु की तरफ कैसे जा रहे जा रहे थे और दूसरा चैप्टर जोका दूसरा खंड जो है इस पुस्तक का दूसरा पार्ट है जो इसी का हिस्सा है वो यह है कि मैं मारूंगा गांधी को इस सेकंड पार्ट है जो बुक का उसके अंदर गोरसे की कहानी नाथम की कहानी है तो इसमें
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जो नाथुराम गोट से की कहानी जो है तो उसका जो आप पहला चैप्टर जो आपने नाम बताया वो है रामचंद्र से नाथुराम त तो जब बड़ा दिलचस्प ये बात है कि जब गोट से पैदा हुआ था तो उसके घरवालो ने उसका नाम रामचंद्र
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रखा था म उसका पूरा नाम था रामचंद्र विनायक गोट से लेकिन हुआ क्या कि गोट से परिवार में एक अंधविश्वास था मब उसके पिता और उसके माता को अविश्वास था नाथम गोसे को क् क्योंकि गोसे के पहले जो उनके तीन बेटे हुए थे तीनों के तीनों मर गए थे कम उम्र
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में ही तो उसके परिवार को ये शक था डर था कि ये भी इसके साथ भी कुछ ऐसा हो सकता है तो वो एक किसी पुजारी पंडित या ज्योतिषी के पास गए तो उसने कहा कि इसको तुम अगर लड़की की तरह उसको शुरुआती साल में पा लोगे तो इसको ये श्रप नहीं लगेगा और ये बच
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जाएगा तो बचपन में नाथुराम गोट से को लड़की की तरह पाला जाता था और उसकी नाक में एक नथ पहनाई गई थी तो जब उसकी नाक में नथ पहनाई गई तो ब लोगों ने जो उस जमाने में होता था कि किसी भी जो आपके कुछ भी ऐसा होता था तो आपका नाम भी उसी तरह का पड़ जाता था तो उसके आसपास के लोग परिवार
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के लोग उसको नथिया बोलने लगे नथ की वजह से तो ऐसे नथिया से बनते बनते उसका नाम नाथूराम हो गया तो फिर उसका जो असली नाम जो आज पूरा इतिहास में उसका नाम दर्ज है वो नाथूराम गोरसे है तो ये जो चैप्टर है रामचंद्र से नाथूराम गोरसे तक तो वो उसकी जो शुरुआती जीवन है जहां तक वो उसके अंदर
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उसके अंदर विचारधारा के तौर पर एक युवा के के तौर पर किशोर के तौर पर जो बदलाव आ रहा है एक वो पूरा इसके अंदर चैप्टर के अंदर तो बड़ा दिलचस्प इसके अंदर एक किस्सा आता है कि शुरुआत में जब नाथूराम गोट से किशोर अवस्था में था यानी जब वो 1617 साल की उम्र में था तो वो गांधीवादी था उसका
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आदर्श जो है वो महात्मा गांधी हुआ करते थे और चूंकि उसकी इच्छा थी कि वो गांधी के जो सत्याग्रह है उसमें हिस्सा ले लेकिन उसके पिताजी चूंकि सरकारी नौकरी में थे वो डाकखाने के अंदर कर्मचारी थे तो वो गांधी के आंदोलनों में शामिल नहीं हो पाया उसके परिवार की तरह से उसको रोक दिया गया घर का
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सबसे बड़ा बेटा था उसके ऊप पर जिम्मेदारियां थी लेकिन फिर भी वो गांधी के प्रति उसकी इतनी श्रद्धा थी नाथूराम गोड से की अपने छात्र जीवन में शुरुआती जीवन में कि एक बार जब उसके गांव में गांधी के कुछ सत्याग्रही रुके तो बिना अपने परिवार को सूचित करके वो सारे सत्याग्रही हों को उसने कहा कि आप मेरे घर
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भोजन करने चली और 152 गांधी के जो सत्याग्रही थे उनको लेकर वो अपने घर पहुंच गया तो उस जमाने का एक अलग तरह के संस्कार होते थे मेहमान अगर कोई आज जाते घर में तो उनको भगाया नहीं जाता था तो उसकी मां ने भोजन करवा दिया लेकिन जब भोजन करवा के सप्ताह गांधी के चले गए तो नाथुराम गोसे
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के पिता ने उसका बहुत डाटा और कहा कि तुम जानते हो कि मैं सरकारी नौकरी में हूं और तुम मुझसे बिना पूछे इस तरह से गांधी की सत्याग्रही देकर आ गया तोसे मेरी नौकरी पर आ सकती है आगे से गलती मत करना तो नाथ गट से का बचपन कुछ इस तरह का था लेकिन उसके जीवन में परिवर्तन बड़ा ही दिलचस्प जो
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मोड़ आता है कि कई बार जो आपके सितारे होते हैं वो आपके लिए कुछ रास्ते तय कर देते हैं और आपके जीवन एकदम बदल जाता है तो नाथम गो के जीवन में यही हुआ कि उसके पिता का जो ट्रांसफर था वो रत्नागिरी कर दिया गया सरकार ने रत्नागिरी उनका ट्रांसफर कर दिया उसके पिता का तो रत्नागिरी के अंदर जिस मोहल्ले में
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उन्होंने घर लिया किराए पर उसी मोहल्ले में अगली एक गली छोड़कर वीर विनायक दामोदर सावरकर रहते थे तो वीर सावरकर उस वक्त रत्नागिरी के अंदर अपना जो अंग्रेजों ने जब उनको पहले तो काला पानी भेजा था फिर जेल में शिफ्ट किया था उसके बाद उनको नजरबंदी के अंदर वहां पर रखा गया
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तो ये 1900 29 28 की बात है नाथ गोड की उम्र जो थी वो करीब करीब 20 साल के आसपास हो चुका था तो वोक उद्देश वक्त था नाथम गोट से उसको आसपास की चीजें जानने का और जो देश में आंदोलन चल रहे हैं उसकी उसको
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जानकारी थी क्योंकि वो खुद महाराष्ट्र से आता था तो वीर सावरकर के बारे में भी जानता था उनसे भी प्रभावित था गांधी के साथ साथ तो वीर सावरकर से मिलने पहुंच गया तो वीर सावरकर जब उससे मिले तो वीर सावरकर ने महसूस किया कि इस लड़के के अंदर कुछ ऐसा है जो अन्य लोगों में नहीं होता क् वो
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शाप था नाथ से बचपन से भले पढ़ाई लिखाई में वो बिल्कुल बहुत ही एवरेज था या कहले बिलो एवरेज था दवी के बाद उसने पढ़ाई छोड़ दी थी लेकिन चकि वीर सावरकर को भी एक अपने सहयोगी की जरूरत थी तो उन्होने नाथरा गट से को एक तरह से अपना पर्सनल असिस्टेंट बना लिया तो वो नाथुराम गोन के लिए पत्रों
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के ड्राफ्टिंग का काम फाइल मेंटेन करने का काम करने लगा फिर वीर सावरकर ने उसे अंग्रेजी सीखने को कहा तो आठवी पास नाथम से लेकिन वीर सावरकर कहने पर उसने अंग्रेजी सीखी वीर सावरकर उसे प्रतिदिन जो है किताबें पढ़ने के लिए देते थे तो वहां से जो उसकी विचारधारा जो गांधीवाद की
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विचारधारा थी उसकी किशोर अवस्था तक वो जब जवानी की अवस्था में पहुंचा और वीर सावरकर के संपर्क में आया तो वो हिंदुत्व की विचारधारा की तरफ मुड़ गया और उसके आदर्श जो सांगी में जब तक उसका परिवार रहता था तो उसका आदर्श जो महात्मा गांधी हुआ करते थे वो रत्नागिरी में आने के बाद जब 20 साल
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से आगे बढ़ता उसका जीवन तो उसके आदर्श जो है वीर सावरकर हो जाते हैं और वीर सावरकर गांधी की जो राजनीतिक विचारधारा वो कितनी अलग थी सबको मालूम है तो वहां से गोट से के जीवन में परिवर्तन आता है तो इसीलिए मैंने इस चैप्टर का नाम जो है वो रामचंद्र से नाथम तक रखा है फिर आपने दूसरा चैप्टर
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का जिक्र किया मिस्टर एंड मिसेस आपटे तो ये मिस्टर एंड मिसेस आप्टे जो कहानी है बेसिकली नाथ गोरसे का जो दोस्त था नारायण आपटे ये उसकी पूरी कहानी है दरअसल नाथुराम गोसे को फांसी जो हुई थी गांधी हत्याकांड में तो गोरसे के साथ साथ
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नारायण आपटे को भी फासी हुई थी क्योंकि अदालत ने माना था कि यही दोनों असली मास्टर माइंड है जिन्होंने गांधी की हत्या का पूरा प्लान बनाया और गांधी को हत्या को अंजाम तक पहुंचाया तो ये ना बो से का बड़ाही खास आदमी था नारायण आपटे मतलब खास दोस्त और दोनों के चरित्र में बड़ा ही
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अंतर था नाथुराम गोट से ने किशोर अवस्था और जवानी के दिनों से ब्रह्मचर्य का पालन उसने शुरू कर दिया था स्त्रियों से दूर रहता था घर में उसने कह दिया था कि मैं शादी नहीं करूंगा और आप चाहे जो कर ले मैं शादी नहीं करूंगा बाकी आपके सारे कहने मानूंगा तो उसने अपना पूरा जीवन जो है वो
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भी एक हिंदुत्व के कॉस के लिए लगा दिया लेकिन नारायण आपटे बिल्कुल उल्टा था नारायण आपटे के अंदर संसार के अंदर जो भी उस दौर के अंदर जो एक युवा के अंदर बुराइयां मौजूद हो सकती है वो नारायण आपटे के अंदर थी उसकी शादी हो चुकी थी उसका एक बच्चा था उसके बाद भी उसके शादी के बाहर भी
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एक्स्ट्रा मेरिटल अफेयर चलते थे तो मिस्टर एंड मिसेस आपटे मैंने इसलिए लिखा है क्योंकि जब वो होटलों में लड़कियों को लेकर मिलने के लिए पहुंचता था तो जो होटल का रजिस्टर था रजिस्टर होता था उसके अंदर वो मिस्टर एंड मिसेस मिसेस आपटे लिखता था तो एक लड़की जिसका नाम मिसेस आपटे लिखता
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था उसका नाम मनोरमा सालवी था क्रिश्चन लड़की थी और उसकी स्टूडेंट थी नारायण आपटे स्कूल में पढ़ाता था तो उसकी स्टूडेंट रह चुकी थी उसके साथ उसका अफेयर चलता था मनोरमा सालवी के साथ तो मनोरमा सालवी के साथ जब भी वो होटल में मिलने जाता था तो मिस्टर ए मिसेस आपटे लिखता था और यही
37:03
मनोरमा सालवी जो है बाद में जाकर नारायण आपटे के खिलाफ एक बहुत बड़ी गवाह तैयार हुई क्योंकि उसको आपटे के जीवन के कई राज मालूम थे तो इसमें आपटे का पूरा कैरेक्टर जो है वो मैंने इस चैप्टर के अंदर लिखा फिर तीसरा चैप्टर का जिक्र कर रहे संपादक गटस मैनेजर आप तो वो इसलिए लिखा है जब इन
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दोनों की दोस्ती होती है क्यक नारायण आपटे भी वीर सावर कर को अपना नेता मानता था और नाथुराम गोर से भी मानता था जब इनकी मुला होती है तो मिलकर प हिंदू राष्ट्र दल नाम सेर नाम से संगठन बनाते हैं वो संगठन बहुत सफल नहीं हो पाता तो उसके बाद सोचते की एक
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अखबार शुरू किया जाए तो यह अग्रणी दैनिक अग्रणी के नाम से पुणे में एक अखबार शुरू करते हैं तो उस अखबार का जो संपादक होता है व नाथम गो से होता है और सार का जो मैनेजर होता है व नारायण होता है तो वो य अखबार शुरू करते हैं अखबार के अंदर व हिंदु की विचारधारा को आगे बढ़ाते हैं और
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गांधी के खिलाफ बड़े क्रिटिकल आर्टिकल इस नाथम लिखता है मेरे मित्र पुणे में रहते है जर्नलिस्ट है वो तो वो अभी रिसर्च कर रहे पत्रकार के तौर पर ना से कैसा था हो सकता र् जल्दी सामने आएगा व गोसे के लेख का अध्ययन कर रहे मराठी भाषा में अखबार था
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तो गोसे बड़े जिसको कहते जहरीली भाषा में गांधी के लिए इसके अंदर लेख वगैरह लिखता था तो इसलिए उसकी जो पकारी जीवन की पत्रकारिता के जीवन की जो यात्रा है उस चैप्टर में मैंने लिखि का नाम है संपादक बो आपटे मैनेजर तो ये इसके अंदर इकी पूरी
38:25
कहानी आती है जी अच्छा आपने इधर अपनी पुस्तक में पिस्टल नंबर एक लिखी है पिस्टल नंबर कौन सी पिस्टल नंबर और एक पुस्तक में आपने मतलब ये इतना डिटेल में है यह कि बच जाते बापू
38:42
सुरक्षा में पतर चूक कि तो यह जो एक सोशल मीडिया पर चलता रहता है कि कितनी गोलियां थी कितनी लगी आपने शुरू में भी थोड़ा रेफरेंस दिया था इसके बारे में तो ये जो सुरक्षा चूक जो हुई महात्मा गांधी की
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हत्याकांड में इसके पीछे कोई राजनीतिक षड्यंत्र था या जो गोलियां जो चलाई गई वह जो आप बता रहे थे कि जो मिस हुई और फिर जो एक तीन नहीं मैंने सब मिस होने वाला इसमें नहीं लिखा लेकिन देखिए मैं आपको एक गोली एक दूसरे की तरफ गई दूसरी दूसरे की तरफ ग
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नहीं मैं इस थरी मैं इस थ्योरी को नहीं मानता ना मेरी पुस्तक में थ्योरी है लोगों का अपना अपना एक रिसर्च होता है उसके बेस पे ग लेकिन जितना मैंने रिसर्च किया इस विषय पर करीब करीब मैंने 17 साल तक काम किया 2005 से लेकर 2022 तक तो मैंने जितना रिसर्च किया मुझे ऐसा कोई जानकारी नहीं मिलती कि गोडस ने जब गांधी को गोली मारी
39:33
थी तो उसने तीन गोलियां चलाई थी लेकिन जब खुद गोडसे का जो बयान है वो कहता है कि मैंने दो बार टिकर दबाया था क्योंकि वो ऑटोमेटिक पिस्टल थी तो उसने जब दूसरी बार टगर दबाया तो एक एक के बाद एक गोलियां निकली और तीन गोलियां निकली और तीन गोलियां चल रही थी चेंबर के अंदर जो
39:49
गोलियां बची थी वो सब जो एविडेंस जो मेरी जानकारी मिलता है वो गांधी को तीन गोलियां मारने का मिलता है ये नहीं मिलता कि वो चौथी गोली मारी गई थी या कहीं और स फाय हुआ था या कोई मिस फायर की गई थी ये मेरी जानकारी में नहीं मिलता तीन गोली मारी थी और जैसा पुलिस रिकॉर्ड में लिखा हुआ है करीब करीब वही मिलता है अब ये नहीं कहता
40:04
किसका दावा क्या है किसी और का दावा चार गोली का है चौथी गोली किसी और ने मारी या कहीं और से चली तो वो अपना रिसर्च है उसका वो उसको साबित करे वो उसको बताए अगर लोगों को लगेगा तो उसको सही मानेगा लेकिन मेरा जो रिसर्च है वो ये कहता है अब आपने बात की शायद पिस्टल की कि पिस्टल कैसे आई या
40:22
कहां से आई तो असल में पिस्टल जो है वो गयर से ली गई थी और मैं उसको उस कहानी बताने के पहले जो आपने चूक की बात की मैंने पूरा चैप्टर लिखा है कि तो बच जाते पापू अगर नहीं होती 75 चूक तो मैं बहुत जिम्मेदारी से कह रहा हूं कि मैंने 75 चूक शायद कम लिख दी अगर गांधी को
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बचाने में जो नाकामी है अगर नाकामियों गिनी जाए तो 75 से कहीं ज्यादा है वो सैकड़ों में मतलब दुर्भाग्य की बात इस देश में कि जब भी हम गांधी की हत्या की बात करते हैं तो हम उंगली उठाते हैं हिंदुत्व प हम उंगली उठाते हैं उन संगठनों पर जिसका
40:56
कोई लेना देना नहीं था हम गांधी की हत्या को अलग ही एंगल में ले जाते हैं और ये चर्चा करने लगते हैं कि एक हिंदू अतिवादी ने आकर गांधी को मार दिया लेकिन कोई भी दुर्भाग्य से इस देश में चर्चा नहीं करता कि गांधी को बचाने की कोशिश क्यों नहीं की क्योंकि लोगों को तो ये मालूम ही नहीं है
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कि गांधी की हत्या के 10 दिन पहले नाथुराम गोट से और उसके बाकी के छह जो साथी थे उन्होंने 20 जनवरी गांधी की हत्या के 10 दिन पहले 20 जनवरी 1948 की शाम गांधी को मारने की असफल कोशिश की थी और इनका प्लान
41:26
ये था कि पहले मदनलाल पवान का साथी था वो पहले बम फोड़े प्रार्थना सभा में बम फटेगा उसके बाद भगदड़ मचे गी भगदड़ मचने का फायदा उठाएंगे हम लोग और गांधी पर ग्रेनेड और गोलियों से हमला करके हम गांधी की हत्या कर देंगे तो मदनलाल पहवा ने बम तो फोड़ दिया लेकिन हदर नहीं मच पाई तो जैसे
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होना था गांधी ने उसको रोक दिया ट में अगर आप जाएंगे तो गांधी की पूरी स्पीच पड़ी हुई है जिस बम फूटने की आवाज तक आती है और गांधी कहते नहीं नहीं रुक जाइए ये कोई आर्मी के लोग यहां पर अभ्यास कर रहे होंगे दूर वो आवाज आई होगी कोई भागने की जरूरत नहीं डरने की नहीं है तो भगर नहीं बच पाती और य अना लोग थे ये कोई बहुत प्रोफेशनल क्रिमिनल नहीं थे नाथरा उसके साथी तो ये
42:03
पैनिक हो जाते हैं और य वहां से भाग जाते हैं लेकिन मदनलाल पाहवा नहीं भाग पाता वो जिसने बम फोड़ा था वहां पर तो मदनलाल पाहवा स्पॉट पर गिरफ्तार हो जाता है तो मदनलाल पाहवा को जब पुलिस मारती है तो मदनलाल पाहवा सारे राज उगल देता है वो बता देता है कि ग्रुप का जो लीडर है
42:20
वो एक अग्रणी नाम के अखबार का संपादक है जो दूसरे नंबर का व्यक्ति है वो अग्रणी अखबार का मैनेजर है मतलब वो नाथुराम गोट से और नारायण आप्टे की पहचान जाहिर कर देता है वो विष्णु करकरे का नाम बता देता है जो बहुत बड़ा व्यवसाई था अहमदनगर का जो
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उस वक्त मौके पर मौजूद था इनका साथी था और साथ में काउंसलर भी था पार्षद भी था अहमदनगर में तो वो उसका नाम बता देता कि विष्णु करकरे जो पार्षद होटलों का मालिक है वो भी इस ग्रह में शामिल है वो गोपाल गोट से के बारे में बता देता नाथम गोट से का भाई है वो दिगंबर बड़ग के बारे में बता
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देता है कि हथियारों का सौदागर है वो दिगंबर बड़ग के नौकर के बारे में बता देता शंकर उसका नौकर भी इस शामिल है छ लोगों के नाम वो पुलिस को मतलब पूरे जानकारी दे देता है अब एक बात बताइए कि उस दौर में भी भारत में जितने अखबार छपते थे उन सबका कौन
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मालिक है उनका कौन सा कौन संपादक है उनका कौन मैनेजर है उसका पता क्या है सारी जानकारियां जो थी वो दिल्ली के अंदर मौजूद होती थी मतलब एक तो एनबी मिनिस्ट्री में मौजूद होती थी इसके अलावा आईबी डिपार्टमेंट इंटेलिजेंस ब्यूरो होता था उस
43:26
अंग्रेजों के जमाने का कंटिन्यू हुआ था उसके अंदर वो जानकारी मौजूद होती थी और अग्रणी अखबार को छोटा मोटा अखबार नहीं था मतलब पुणे का ठीकठाक अखबार था जिसकी अच्छी खासी कॉपिया वहां पर बिकती थी क्योंकि हिंदूवादी विचारधारा के लोग उस अखबार को बड़ा पसंद करते थे तो मुझे बताइए कि पुलिस
43:43
को मालूम पड़ जाता है कि जो मुख्य इसका गांधी की हत्या का प्लान बनाने वाला जो मुख्य व्यक्ति है वो अग्रणी अग्रणी अखबार का संपादक है तो पुलिस 10 दिन तक उस अग्रणी अखबार के संपादक यानी नाथूराम विनायक गोट को ढूंढ क्यों नहीं पाई उस
43:59
अखबार के मैनेजर को जो नारायण आपटे था जिसका नाम दर्ज था सरकारी कागजों में उसको क्यों नहीं ढूंढ पाई इतने ही नहीं मतलब मैं अगर आपको बताना शुरू करूं छोटी छोटी जो गलतियां की है पुलिस ने म जो कहने को छोटी है लेकिन कितनी बड़ी गलती वो साबित हुई अगर मैं आपको बताना शुरू करूं तो हम
44:16
तीन से चार घंटे तक इसी विषय पर चर्चा करते रहेंगे अ एक एक गलती गांधी की जान लेने के लिए काफी थी और ऐसी इन्होंने एक गलती नहीं की इन्होंने जाना कितनी गलती की मैं बार-बार कहता हूं कि बच्चे जब हम आप भी जब छोटे रहे होंगे मैं भी जो छोटा रहूंगा जो हमारे दर्शक हमको सुन रहे हैं
44:32
वो भी जो छोटे रहेंगे तो हम सबने चोर सिपाही का खेल खेला है बचपन में तो चोर सिपाही का खेल खेलते वक्त बचपन में जो गलतियां हमने नहीं करी या जो छोटे-छोटे बच्चे चोर सिपाई का खेल खेलते वक्त गलती नहीं करते वो इस देश की तीन शहरों की
44:47
पुलिस ने करी दिल्ली पुलिस ने मुंबई पुलिस ने पुणे पुलिस ने मतलब इन तीनों पुलिस ने ऐसा घालमेल किया कि गांधी को एक तरह से मब अच्छा शब्द नहीं लेकिन कहना पड़ता है मुझे बहुत सीधे पत्थर रखकर कि इन्होने गांधी के
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गले में से बकरी के गले में नहीं रस्सी बांधकर खूटे से बांध देते हैं कि कोई जंगली जानवर आएगा शिकार कर लेगा उस बकरी का ऐसे इन्होने गांधी को छोड़ दिया गांधी के जीवन को तश्तरी पर रखकर इन्होने एक तरह से सौप दिया और गांधी की हत्या करने में गट से कामयाब हो गया इतनी चूक अगर दिल्ली
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पुलिस का कांस्टेबल मैं किसी आईपीएस अधिकारी की बात नहीं कर रहा मैं किसी डीसीपी डीएसपी की बात नहीं कर रहा मैं किसी इंस्पेक्टर की बात नहीं कर रहा दिल्ली पुलिस के कांस्टेबल को या मुंबई पुलिस के कांस्टेबल को या पुणे पुलिस के कांस्टेबल को या अहमदनगर पुलिस के अदने से कांस्टेबल को मदनलाल पहवा का बयान दिया
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जाता और कहा जाता इस बयान को पढ़ो और जो लोग इसके जिनके बारे में बता रहा उनको पकड़ कर लाओ तो कांस्टेबल तीन दिन के अंदर सबको थाने के अंदर बंद कर देता इतना ओपन एंड शट केस था लेकिन नहीं किया गया एक पर एक गलती एक के बाद एक गलती एक के बाद एक
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गलती करते गए और वो जो अनाड़ी क्रिमिनल जो क्रिमिनल थे ही नहीं अनाड़ी लोग थे जो बिल्कुल बचकाने प्लान जिन्होंने गांधी को मारने के बनाए थे वो गांधी को मारने में कामयाब हो जाते हैं तो इस देश को इस देश में इस बात की चर्चा होना चाहिए कि गांधी को बचाने में कौन लोग नाकाम रहे मैं बहुत
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जिम्मेदारी से कहना चाहता हूं कि अगर इस देश में जो नेहरू को मानने वाले लोग है जो नेहरू वाद की बात करते हैं नेहरू वादी अपने आप को कहते हैं और जो कहते हैं कि इस देश में आईआईटी की स्थापना का श्रेय नेहरू को है जो कहते हैं कि इस देश में एम्स की स्थापना का श्रेय नेहरू को है जो कहते हैं
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कि इस देश में कारखाने लगाने का श्रेय नेहरू को है जो देश में इसरो बनाने का श्रेय भी नेहरू को दे देते हैं जो नेहरू को धर्मनिरपेक्ष का ठेकेदार बताते हैं लोकतंत्र का मसीहा बताते हैं तो सारे क्रेडिट नेहरू को देते हैं लेकिन अगर
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नेहरू इन सबके लिए नेहरू का नाम आता है कि नेहरू ने इतना सब कुछ किया था तो नेहरू को फिर जिम्मेदार भी ठहराया जाना चाहिए गांधी की हत्या के लिए कि वो गांधी को नहीं बचा पाए ठीक सिर्फ नेहरू ही नहीं सरदार पटेल का भी य पर जिक्र होना चाहिए सरदार पटेल को मानने वाले लोग कहते हैं कि उन्होंने भारत में
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500 से ज्यादा रियासतों का विलीनीकरण किया भारत को एक मजबूत भारत बनाया वो लोह पुरुष थे उन्होने हैदराबाद को भारत में विलीनीकरण किया लेकिन सवाल यह भी है कि गृहमंत्री होने के नाते सरदार पटेल की जिम्मेदारी थी कि गांधी को सुरक्षा देते
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लेकिन वो गांधी की जान बचाने में नाकाम हुए ये लोग बद में नेहरू और पटेल बारबार ये बाद में कहते रहे गांधी हत्या के बाद जब इनसे पूछा गया क्यों ऐसा हुआ तो कहते थे कि गांधी तो सुरक्षा लेने को तैयार ही नहीं थे हमने उनको सुरक्षा ऑफर कर उन्होंने सुरक्षा के लिए मना कर दिया तो भाई गांधी की तुमने कौन सी बात आखिरी समय
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में मान ली थी गांधी के अगर अंतिम जीवन में आप उनके अंतिम एक साल निकाल के देखें तो नेहरू और पटेल को गांधी ने जो जो कहा इन दोनों ने हमेशा उसका उल्टा किया गांधी कहते थे कि भाई बड़े कारखाने नहीं होते थे इन्होंने कारखानों की बात की गांधी कहते थे सेना नहीं होना चाहिए इन्होंने सेना की
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बात की गांधी तो कहते थे अहिंसा की बात करते थे तो इन्होंने युद्ध भी लड़े पाकिस्तान से शुरुआत में इन्होंने तो तमाम गांधी की जो नीतिया थी उनके उल्टे ये लोग चल रहे थे गांधी आचार्य नरेंद्र देव को कांग्रेस का अध्यक्ष बनाना चाहती थी इन्होने आचार्य नरेंद्र को तो गांधी की कोई बात नहीं मानते थे अंतिम समय में ये
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सुनते नहीं थे गांधी की लेकिन गांधी की कोई बात ना मानने के बाद गांधी की सिर्फ एक ही बात मानी कि तुम मुझे सुरक्षा नहीं दो बोला ठीक है बाप हम आपको सुरक्षा नहीं देते तो ये बड़ी अजीब चीज और गांधी के जो पोते हैं तुषार गांधी उन्होंने तो जब एनजीटीवी में काम करता था तो उन्होने हमने
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शो बनाया था गांधी हत्याकांड प तो उन्होंने उस इंटरव्यू में बात कही थी कि सरदार पटेल नेहरू के लिए बहुत आसान था कि साल में वो दो दिन यानी 30 जनवरी और दो अक्टूबर को राजघाट जाए कुल चढ़ाए और वापस अपने काम पर लग जाए बजाय इसके कि वो रोज
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बलान जाकर गांधी की ड़ किया सुने मतलब व अपनी पुस्तक में भी उन्होने लिखा है कि जीवित गांधी जो था उनके लिए काफी मुसीबत पैदा करने वाली राजनीतिक तौर पर उनके लिए बात थी तो कहने का मतलब यह है कि कोई विषय
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पर बात नहीं करता सारी बात जो एजेंडा है नरेट जो सेट करने का काम कुछ लोग करते हैं वो सिर्फ गांधी की हत्या को हिंदुत्व से जोड़ते हैं वो कभी गांधी की हत्या का जिक्र करते वत ये नहीं कहेंगे कि गांधी की मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति जिम्मेदार थी पाकिस्तान का 55 करोड़ रुप पाकिस्तान को देना जिम्मेदार था नय और पटेल ने जो उनको
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सुरक्षा उपलब्ध नहीं करवाई वो जिम्मेदार थे कभी बात नहीं करते तो गांधी को बचाना बहुत आसान था बहुत जिम्मेदारी से कह रहा हूं मैं बात गांधी जब नोआखली में थे अपने अंतिम समय में जब नवंबर के अंदर जब वो नखली पहुंचे थे
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जब हिंदुओं का नखली में नसंग हो रहा था तो नखली जो था बंगाल का पार्ट था अब वर्तमान में बांग्लादेश का हिस्सा है और बंगाल में मुस्लिम लीग की सरकार थी और मुस्लिम लीग का जो मुख्यमंत्री था जो बंगाल का मुख्यमंत्री था उसका नाम था सुराव जिसे हम बूचर ऑफ बंगाल कहते हैं जिसने डायरेक्ट
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एकशन डे और नखली के अंदर हजारों हजार हिंदुओं की हत्याएं करवाई बड़ा ही घटिया आदमी था कसाई जिसको बंगाल कसाई कहते हैं वो बंगाल का मुख्यमंत्री था जब गांधी नखली पहुंचे और मुस्लिम बहु इलाका था 80 पर मुस्लिम आबादी थी नखली में और गांधी जब मुस्लिम बहुल इलाकों के अंदर शांति स्थापित करने के लिए गांव गांव
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पैदल घूमते थे तो बंगाल की पुलिस और चूंकि सेना को भी डिप्लॉयड सराव दी के पास था तो सूरा वर्दी ने बख्तर बंद गाड़ियां ब्रिटिश फौज की और हथियारों से लेस पुलिस कर्मी गांधी के साथ लगा रखे थे
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और गांधी के साथ-साथ वो चलते थे और गांधी से जब लोग बोलते थे कि आप तो अहिंसा के पुजारी है आपके साथ ये सेना के और पुलिस के बंगाल पुलिस के लोग चलते हथियार लेकर तो गांधी ये कहते थे कि मैं इसका विरोध करता हूं मैं सुरक्षा नहीं मांगता और मैंने सोरा वर्दी को बारबार पत्र लिखकर
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मैं कहता हूं कि मेरी सुरक्षा हटा लो लेकिन क्योंकि बंगाल सरकार का फैसला है तो मैं क्या कर सकता हूं तो ऐसा नहीं कि अपनी सुरक्षा को लेकर इतने विजिट थे कि नहीं मेरे आसपास कोई पुलिस वाला नहीं होता गांधी कहते थे मुझे सुरक्षा मत दो लेकिन अगर सरकार ये तय कर देती कि भाई आप तय
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नहीं करेंगे जैसे आज भी कई नेता होते हैं राजनीतिक लाभ के लिए कहते हैं कि मैं सुरक्षा नहीं रखूंगा वर्तमान एक आधे राज्य के मुख्यमंत्री है उन्होंने भी नौटंकी की थी कि भैया मैं सुरक्षा नहीं रखूंगा लेकिन सरकार तय करेगी कि आपको सुरक्षा में रहना है कि नहीं रहना है तो
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कहने का मतलब है कि गांधी भले ही मना करते थे सुरक्षा के लिए लेकिन सोराव ने तो वो बंगाल का कसाई जिसको कहते हैं हम जिसको हम विलन मानते हैं उस खलनायक तकने गांधी को सुरक्षा दे दी जिसको भारतीय इतिहास में खलनायक माना जाता है सराव दी को उस खलनायक
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ने गांधी की जान बचाने के लिए सुरक्षा दे दी गांधी को और जिनको नायक माना जाता है देश में वो गांधी को सुरक्षा नहीं देते और य बहाना बनाते गाधी ने सुरक्षा लेने से मना किया था तो इस विषय पर भी चर्चा होना चाहिए लेकिन इस विषय पर चर्चा नहीं होगी क्योंकि जब इस विषय पर चर्चा की जाएगी तो
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जो एजेंडा है इस देश के लिबरल कोंगी लिबरल गैंग का कम्युनिस्ट गैंग का लेफ्ट लिबरल लॉबी काम करती है खुद को सो क सेकुलर कहने वाले लोग उनका टिव है वो दिशा
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भटक जाएगा इसलिए लोग इस विषय पर चर्चा नहीं कर जी नहीं आपने बहुत ही अच्छा बताया इसके बारे में एक एक अंतिम प्रश्न इस सेशन में कि आपको क्या लगता है कि जब जैसे महात्मा
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गांधी का यह मेरा पर्सनल अभी तक मैं बुक से पूछ रहा था गांधी जी ने हे राम करके लोग बोलते हैं कि हे राम करके उन्होने प्राण त्यागे बोलो ये कहां तक सच है देखिए यह आपने ऐसा सवाल पूछा है कि कई लोगों ने
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मुझसे पहले भी बातचीत में पूछा व्यक्तिगत बातचीत में भी कई पाठको ने भी मुझसे सोशल मीडिया प पूछा कि आपने पुस्तक का नाम हेराम कैसे रखा क्यों रखा द ने तो हेराम नहीं कहा था तो पुस्तक का नाम हेराम मैंने क्यों रखा वो मैं आपको थ बाद में बताऊंगा लेकिन जो मेरा अध्ययन लोगों
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के अपने अलग अलग बयान इसको थोड़ा बहुत जो सुनने जो हम आपको भी बोल रहा हूं और जो मेरी बात सुनने वाले दर्शक है उनको भी क रहा जो मैं कहने वाला हको थोड़ा सा सोच समझकर ध्यान से सुनिए देखिए क्या होता है अगर हम एक सामान्य मनुष्य की बात करें
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चाहे वो मैं हूं चाहे वो आप हो चाहे कोई और भी हो जब हमें कोई चोट लगती है तो हमारा पहला रिएक्शन क्या हो या तो हम कहते हैं प्रभु भगवान हे राम ओमा इसी तरह के हमारे मुह से शब्द निकलते हैं तो अगर गांधी को चोट लगी और उन्होंने इस शब्द में
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से एक शब्द हे राम कहा तो ये कोई अनोखी घटना नहीं है ठीक है अब लोग इसका इस्तेमाल अपने अपने नजरिए के लिए करते हैं जो गांधी को मानने वाले लोग हैं वो ये कहते हैं कि देखिए अंतिम समय में भी वो राम का नाम लेकर गए तो कितनी पवित्र आत्मा होंगे मैं
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कहना चाहता हूं कि गांधी के अंतिम शब्दों से आप उनके पूरे जीवन को जज नहीं कर सकते गांधी अगर महान इंसान थे और अंतिम समय में उसके बाद भी अगर मान लो उन्होंने हे राम नहीं बोला तो उनकी महानता पर कोई फर्क नहीं पड़ता है गांधी अगर अंतिम समय में
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सिर्फ आहा बोलकर भी जाते जाते और अगर वो महान थे तो महान ही रहते व हेराम बोलने से उनकी महानता का स्तर कम नहीं हो जाता और उनकी महानता का स्तर कोई बढ़ नहीं जाता यह बात समझने की जरूरत है दूसरी बात अगर कोई खराब व्यक्ति है मैं कई लोगों को जानता
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हूं जिनके माता पिता वृद्धाश्रम में रहते हैं लेकिन उनको जब चोट लगती है तो कहते ओमा तो ओमा कहने से वो मातृ भक्त नहीं हो जाता तो मैं ये कह रहा हूं कि हे राम बोला या नहीं बोला ये इतनी बड़ी बहस का विषय होना ही नहीं चाहिए लेकिन ना जाने क्यों
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लोग इस विषय पर बहस करते हैं क्योंकि मैं फिर दोरा रहा कि गांधी ने हेराम बोला तो इससे वो महान नहीं हो जाते और हेराम नहीं बोला था तो इससे भी उनकी महानता पर असर नहीं पड़ जाता मतलब य ऐसा सवाल है जिसकी कोई चर्चा की मतलब मैं तो इस कोई गुंजाइश
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देता हूं लेकिन लोग अपने विवादों के लिए उस पर बारबार चर्चा करते हैं अब मैंने अपने पुस्तक का नाम हे राम क्यों रखा तो मैंने जो हे राम रखा है वो सिर्फ ये रखा कि हे राम मलब गांधी हत्याकांड से जुड़े इतने अनसुलझी बातें हैं इतने राज है कि हर राज को पढ़ के आपके मुंह से हेराम निकलता
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है जब आप पढ़ते हैं पूरा एक एक चीज को आपके सामने आती है कि गांधी ने यह कहा था या ऐसा हो रहा था या नेहरू ने फैनिंग करके 400 हिंदू किसानों को मरवा दिया था जो किसी को नहीं मानता पढ़ते वक्त अचानक अनाया साब के मुह से निकलता है हे राम तो
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मेरी पुस्तक का नाम उस भाव के साथ रखा जी नहीं एक्चुअली वो गीता का एक श्लोक है ना अंत काल चमा स्मरण मुक्ता कलीम उसके बेसिस पर लोग बोलते हैं क्योंकि वो भगवान बोलते हैं कि किस
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तरह स्मरण करता है अंत में इसलिए लोग बो एक बात बताइए आप आप इतना धर्म आप तो धर्म के बारे में जानते हैं रहते हम लोग जिस परिवेश से आते हैं हम लोग कितने अपने बड़े बुजुर्गों के बारे में सुना है या हम जिस समाज में हम सुनते हैं कि फला व्यक्ति थे अंतिम समय में उने भगवान का स्मरण किया और
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प्रभु की गोद में विलीन हो गए चले गए तो सामान्य मनुष्य मतलब जो आप और हम जैसे सामान्य मनुष्य है उसी समाज से निकले सामान्य से लोग जिने जीवन भर सामान्य जिंदगी गुजारी सामान्य से नौकरी करते रहे सामान्य से अपना जीवन यापन करते रहे वो भी अंतिम समय में भगवान का स्मरण करते हुए
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चले जाते हैं अच्छी बात है तो इसको लेकर अगर गांधी ने भी ऐसा किया तो मतलब मुझे समझ में नहीं आता कि ये हे राम बोला या नहीं बोला ये बोलने से गांधी ना तो छोटे हो जाते हैं ना महान हो जाते हैं अब इस पर चर्चा क्यों होती है क्योंकि हम जो सनातनी
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है ये हम जीवन में हमने हमें सिखाया जाता कि प्रभु का स्मरण करते हुए हमें जाना है सामान्य लोग जो अनपढ़ रहे जिन्होने जीवन में कोई ऐसा बहुत कुछ हासिल नहीं किया प्रभु का स्मरण करते हुए प्रभु की गोद में चले जाते तोर गांधी ने भी हैरान
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बोल दिया आखरी समय में तो इसमें ऐसा क्या हो गया और अगर नहीं भी बोलते तो गांधी कोई उनकी महानता कोई कम नहीं हो जाती तो मेरा मानना कि गांधी के जीवन का आकलन उनके अंतिम शब्दों से नहीं करना चाहिए बल्कि अपने जीवन में उन्होंने जो कहा और जो किया
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और उसका जो असर हुआ इसके आधार पर गांधी की जीवन का बिल्कुल सही बोला आपने और भगवान के पास सामान्य लोग ही जाते हैं जो अपने आप को सामान्य नहीं मानते वो लोग नहीं जाते लाइट बोल रहा हू लोगों के लिए बट एनीवे थैंक यू वेरी मच प्रक श्रीवास्तव जी
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फॉर कमिंग ऑन द श बहु ध और इतना फोर्सफुली आपने मैसेज रखा हैम रियली इंप्रेस्ड आपका कम्युनिकेशन और व्हाट अ वंडरफुल वे पुट योर मैसेज एंड दर्शकों को बता द इनके टाइटल ही बुक के इतने अच्छे चैप्टर्स के मुझे मेरी नई पुस्तक आने वाली है उसके लिए
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मुझे इतना इंस्पिरेशन मिला इनके टाइटल देख के और च कर सता आप मुझे दे तो आप टल चा ता सो थैंक यू ल वेरी मच फॉर जॉइनिंग द शो और लोगों को बताइए और शेयर करिए और लोगों
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को यह मैसेज पहुंचना चाहिए और इसी पर हम लोग बंद करते हैं समाप्त कर सेशन हे राम जय श्री राम नमस्ते थैंक [संगीत] यू
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[संगीत]