श्री तुकाराम जी और कबीरदास जी की तरह अदृश्य शक्ति कैसे पाएं ?सिद्ध संतों का दिव्य अनुभव !Bhajan Marg

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Category: Spiritual Teachings

Tags: ChantingDetachmentDevotionGod's NameSpirituality

Entities: HiranyakashipuKabir DasRavanaShivaji MaharajShri BhagwanSitaram Das Ji MaharajTukaramYamraj

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Summary

    Fear of Death and Detachment
    • A wealthy man expressed fear of losing everything after death, including family and possessions.
    • The speaker reassures that true detachment and fearlessness come from surrendering to God.
    Power of God's Name
    • Chanting God's name is considered the highest form of purification and spiritual practice.
    • One does not need to visit holy places; chanting God's name brings the same benefits.
    • The name of God is described as the ultimate gift, the highest form of charity, and the greatest spiritual practice.
    Spiritual Practices and Beliefs
    • Regular chanting of God's name is emphasized as a way to overcome fear and achieve spiritual liberation.
    • Chanting is considered a yajna (sacred ritual) and is accessible to everyone, regardless of purity.
    • The ultimate duty (param dharma) is to chant God's name, surpassing all other worldly duties.
    Stories of Devotion
    • Historical examples, such as Kabir Das and Tukaram, illustrate the protective and transformative power of God's name.
    • Devotees who chant God's name are protected from harm and experience divine miracles.
    Philosophical Insights
    • The speaker discusses the illusory nature of worldly attachments and the eternal presence of God.
    • People are reminded that they are divine in nature, being a part of God, and should focus on spiritual growth.

    Transcript

    00:00

    एकांतिक में एक बड़े धनी मानी पुरुष आए हुए थे। उन्होंने कहा मुझे कोई प्रश्न नहीं करना लेकिन एक भय है मुझे कि मेरे पास बहुत ऐश्वर्य है। मैंने जीवन में जो चाहा भगवान ने दिया लेकिन अब मुझे डर लग

    00:16

    रहा है कि मेरी मृत्यु हो जाएगी तो मेरा सब कुछ छूट जाएगा। इस डर से कैसे बचें? मेरी प्रिय पत्नी छूट जाएगी, प्रिय पुत्र छूट जाएगा, मकान छूट जाएगा, पद छूट जाएगा। हमने भारतीय कई इनाम प्राप्त किए हैं। वो

    00:34

    सरकारी ऑफिसर थे। बोले मुझे बहुत भय लगता है और रात दिन अब भय लगने लगा क्योंकि मैं वृद्ध हूं तो मेरी अब आगे की जो गति है वो मृत्यु है। मुझे मृत्यु से डर लग रहा है। मृत्यु से इसलिए कि सब कुछ छूट जाएगा। इसका आपके पास कोई उत्तर है?

    00:52

    उनका जीवन भर इसी उत्तर को ढूंढते हुए रहे। बाबा जी बचपन से बने 13 वर्ष की अवस्था से इसी उत्तर को खोजते रहे कि अपना कोई जब नहीं है तो अपना है कौन? तो इसका पता चला श्री भगवान और श्री भगवान

    01:09

    की जो शरण में हो गया वो निर्भय निश्चिंत निशोक निर्विकार यह स्थिति आ गई है। कोई भय नहीं। कैसी भी परिस्थिति हो भगवान के भक्त के

    01:25

    हृदय में कभी भय नहीं होता। कैसी भी परिस्थिति हो भगवान की आराधना करने वाले को कभी शोक नहीं होता। कैसी भी परिस्थिति आ जाए कभी चिंता नहीं होती क्योंकि पता है मेरे भगवान हैं। श्री सीताराम

    01:43

    दास जी महाराज बड़े सिद्ध महापुरुष भी हैं। वो कह रहे हैं नाम भगवान का परम तीर्थ है। यदि आप राधा राधा कृष्ण कृष्ण राम राम हरे हरि ऐसा रट

    02:00

    रहे हो तो आप किसी भी तीर्थ नहीं गए तो आपको जाने की भी जरूरत नहीं गंगा यमुना प्रयागराज काशी गोदावरी जितने भी तीर्थ अपने भारत में है उन सब तीर्थों को जो पवित्रता प्राप्त हुई है पापी पुरुष

    02:19

    के पाप का नाश करके पवित्र करने की वो श्री भगवान से प्राप्त हुई भी है और श्री भगवान के नाम में इतनी पवित्रता विराजमान है जो तीर्थों में भी नहीं है। इसलिए सीताराम दास जी महाराज कह रहे हैं

    02:35

    नाम ही परम शुद्धि सत शुद्धि करम नाम ज्ञान प्रद स्मृतम मुमुक्षु नाम मुक्ति प्रद कामिना सर्व कामनाम अगर आपको अपने पापों का नाश करके परम पवित्र सुखमय जीवन

    02:52

    व्यतीत करना है तो किसी तीर्थ जाओ या ना जाओ आप घर बैठे कुछ मिनट भगवान का नाम जप कर लो देखो को जब हम शरीर छूटेगा और यमदूत हमको ले जाएंगे यमराज के सामने पहुंचेंगे

    03:10

    ये पक्का है आदमी भूला हुआ है वो सोच रहा है मुझे जाना नहीं है नहीं रहे रावण सम अभिमानी हिरणा कश्यप सब वरदानी यहां बड़े-बड़े तपस्वी योगी यति सबको मरना

    03:25

    पड़ा है मरना ही पड़ेगा इसका नाम मृत्यु लोक है यह काल का कसाई वाला है। सब काटे जाओगे। हां, काटने का कुछ अलग-अलग विधान है। किसी का दिल फेल हो गया, किसी की किडनी फेल हो गई, किसी का एक्सीडेंट हो गया, किसी को कुछ हो गया। ये निमित्त बनता

    03:43

    है। लेकिन जाना यहां से सबको है। अगर यमराज के खाते में आपके 100 नाम भी हैं कि आपने 100 नाम जप किए हैं। 108 नाम जप किए। इतने से ही काम हो जाएगा।

    03:58

    एक नाम की कीमत पूरा त्रिभुवन नहीं है। तो आपने जब 100 नाम जप किए तो आपका मंगल हो जाएगा। इसीलिए हम प्रार्थना करते हैं कि 24 घंटे में 24 मिनट भगवान को दे दीजिए। 24 घंटे में यद्यपि जीवन तो केवल भगवान के

    04:16

    लिए आपको प्राप्त हुआ है। पर पूरा जीवन भगवान को ना दे पाए। यह हमारे दुर्भाग्य है। तो हमें 24 घंटे में 24 मिनट तो देना चाहिए। प्रातः कालीन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर के अपनी दिनचर्या करके स्नान करके

    04:32

    शांत एकांत में बैठकर कम से कम 24 मिनट भगवान का सुमिरन कर लीजिए। किसी भी तीर्थ जाने की जरूरत नहीं है। हर तीर्थ में जो तीर्थत्व है वो भगवान के नाम में विराजमान है।

    04:48

    नाम ही पुण्य प्रद क्षेत्र है। आप नाम जप कर रहे हो तो आपको काशी, कांची, अवंतिकापुरी, दारावती, माया कहीं भी जाने की जरूरत नहीं है। सारे पुण्य क्षेत्र

    05:03

    आपको फल प्रदान करेंगे घर बैठे। यदि आप नाम जप कर रहे हैं नाम ही परम देव है। जो नाम है वही श्याम है। जो श्याम है वही नाम है। जे नाम ते कृष्ण जो नाम जप रहे हैं

    05:21

    बोले कृष्ण कृष्ण कृष्ण तो साक्षात भगवान कृष्ण कृष्ण नाम रूप से आपकी जिभ्या में विराजमान है। इसलिए नाम ही परम देव है। नाम ही परम तपस्या है। देखो जप करके।

    05:37

    टीवी तीन घंटे फिल्म देखो आपका मन कहीं नहीं दौड़ेगा और तीन मिनट नाम जपना शुरू कर दो मन भागने लगेगा संसार में जाने लगेगा यदि संसार से मन को खींच करके भगवान के नाम में आप लगाते हैं ये सबसे बड़ी

    05:53

    तपस्या है सबसे बड़ी तपस्या है मन को संसार से खींच करके भगवान के परम मधुर नाम में लगाना नाम में अपार सामर्थ्य है। नाम ही परम दान है। यदि आप किसी भूले हुए जीव

    06:11

    को यह प्रेरणा देते हैं कि आप पांच मिनट ही नाम जप कर लिया करें और वो नाम जप करने लगा तो मंगल तो नाम जापक का होगा ही लेकिन जिसने नाम की प्रेरणा की यह सबसे बड़ा दान है। भगवान के नाम से भूला हुआ जो जीव माया

    06:29

    में आसक्त है उसे कुछ मिनट नाम जप करने की आदत डलवा दे। प्रेरणा दे दे उसका स्वभाव बन जाए कुछ मिनट नाम जप करने का इससे बड़ा कोई मंगलमय कार्य इससे बड़ा कोई दान पुण्य नहीं है।

    06:46

    नाम ही परम क्रिया है। जैसे क्रियाओं में आता है यज्ञ करना तो यज्ञ में सबसे बड़ी यज्ञ है जप यज्ञ। भगवान ने स्वयं कहा है यज्ञों में जप यज्ञ मैं हूं।

    07:03

    अगर जप यज्ञ आप बैठकर नहीं कर सकते तो इसमें तो बड़ी मंगलमय छूट है। आप अपवित्र हो या पवित्र अपवित्र पवित्र सर्वांगतो या स्मरे पुंडरी काक्षम सवायांतरा सूची जो

    07:20

    भगवान पुंडरी काक्ष कमल नयन श्री हरि का स्मरण करता है वो बाहर और भीतर दोनों जगह पवित्र हो जाता है। आप मानो स्नान नहीं किए हैं तो भी आप बैठकर के सोफा में कुर्सी में जैसे बने आपको अगर आप हरि हरि

    07:35

    राम राम कृष्ण कृष्ण राधा राधा राधा ऐसा रटते हैं तो आप परम पवित्र हो जाएंगे भीतर से भी और बाहर से भी इसलिए यज्ञ नाम जप यज्ञ यज्ञों में सबसे बड़ी यज्ञ में जप

    07:52

    यज्ञ हूं बैठकर भगवान का नाम जप करना यह बहुत बड़ी यज्ञ है परम धर्म छोटे-छोटे धर्म है। एक भाई का भाई के प्रति क्या धर्म है? पति का पत्नी के प्रति क्या धर्म है?

    पत्नी का पति के

    08:08

    प्रति क्या धर्म है? बेटे का पिता के प्रति क्या धर्म है?

    पिता का पुत्र के प्रति क्या धर्म है? इस तरह से लोक धर्म बहुत छोटे-छोटे हैं। अगर आप अपना मंगल चाहते हो तो परम धर्म नाम भगवान का नाम जप

    08:24

    करना भी तुम्हारा परम धर्म है। जैसे पत्नी का पोषण करना, पुत्र का पोषण करना, पिता की सेवा करना यह धर्म है। तो यह परम धर्म है। भगवान का नाम जप करना। अवश्य नाम जप करना चाहिए। इसके बिना सो सब धर्म कर्म जर

    08:42

    जाऊ। वो सब धर्म कर्म में आग लगे जिसमें हम इतना रम गए कि भगवान का नाम ही भूल गए। भगवान का स्मरण करना ही भूल गए। हर जीव गर्भ में भगवान से वादा करके आता है। एक

    08:57

    बार मुझे मां के गर्भ रूपी नर्क से बाहर कर दो। हे प्रभु मैं ऐसा भजन करूंगा कि दोबारा इस नर्क में ना आ ना पड़े। पर भूमि परत भा ढाबर पानी तिम जीवह माया लपटानी जैसे आकाश से निर्मल शुद्ध जल गिरता है

    09:13

    भूमि में पड़ते ही गंदा हो जाता है ऐसे ही जीव जे ही मां के गर्भ से निकला उसका ज्ञान नष्ट हो गया कहां कहां कहां वो रोने लगा और घर वाले आनंद मनाने लगे बच्चा हुआ हम फिर भूल गए जैसे जैसे सयाने होते गए

    09:30

    माया के संबंधों को सत्य मानते ये मेरी मां मां ये मेरे पिता ये अमुक अमुक अमुक अमुक और भूल गए कि हम आए थे भगवान का भजन करने के लिए इसलिए परम धर्म है भगवान का नाम जप करना

    09:46

    परम धन है नाम कबीरा सब जग निर्धना धनवंता नहीं कोई धनवंता सोई जानिए जाके राम नाम धन हो जब आप यहां से शरीर छोड़ेंगे एक सिक्का आपके

    10:02

    साथ नहीं जाएगा केवल भगवान उनका नाम आपके साथ जाएगा। इसलिए नाम ही परम अर्थ है, परम धन है। नाम ही भक्त का सुहद है। सुद माने बहुत प्यार

    10:17

    करने वाला। प्रह्लाद जी से उनके मित्र पूछते हैं कि प्रह्लाद जी आपकी आयु तो पांच वर्ष की है। कौन सी शक्ति आप में है कि त्रिभुवन पति हिरण्यकश्यप आपको आग में जलाता है। विष

    10:33

    पिलाता है। सर्पों से डसवाता है। हाथी से कुचलाता है। पर्वतों से नीचे दबाता है। समुद्र में डूबाता है। लेकिन आपका बाल बांका भी नहीं होता। ऐसा क्यों? तो उन्होंने कहा मैं हरि नाम जपता हूं। हरि नाम के प्रभाव से मुझे भगवान गोद में लिए

    10:50

    रहते हैं। तो ये दैत्यराज जितना विघ्न डालता है मेरा हरि नाम में उतना विश्वास और होता है। सबसे बड़ा भक्त का प्रिय सुहद है भगवान का नाम। जहां कोई तुम्हें नहीं बचा सकता वहां भगवान बचा सकते हैं। बड़े-बड़े अंग रक्षक

    11:08

    रख लो। बुद्धि खराब हो गई तो अंग रक्षक ही तुम्हें सूट कर देगा। लेकिन भगवान का नाम पाहू दिवस निश ध्यान तुम्हार कपाट यदि भगवान का नाम आप स्मरण कर रहे हैं और वो आपकी रक्षा कर रहा है तो सुदर्शन चक्र

    11:24

    आपकी रक्षा कर रहा है कभी कहीं कोई बाल बांका नहीं कर सकता भगवान का नाम भक्त का परम सुद है मित्र है और इस संसार के दुखों से मोक्ष केवल भगवान का नाम दिला सकता है

    11:40

    आज कलयुग है कलयुग में कोई अन्य साधनाएं पुष्ट नहीं हो सकती। कलयुग केवल नाम आधारा सुमिर सुमिर नर उतरह पारा केवल भगवान का नाम इसमें पैसा नहीं लगता। भाई इसमें पैसा देना हो तो परेशानी हो कि

    11:58

    भाई ये धनी लोग ही ले सकते हैं नाम। नाम में पैसा केवल तुम्हें समय देना है। वह भी अगर बैठकर नहीं दे सकते तो चलते फिरते उठते बैठते खाते पीते कार्य करते आप भगवान के नाम का स्मरण कर सकते हैं। अरे प्रीतम

    12:16

    तुम डर क्यों रहे हो? तुम केवल मेरा नाम लो। देखो तुम्हें किसी से नहीं डरना। मैं वो हूं। मेरे डर से अग्नि प्रज्वलित होती है।

    12:32

    मेरे डर से सूर्य तपता है। मेरे डर से देवराज इंद्र अपना कार्य करते हैं। वायु देवता अपना कार्य करते हैं। मृत्यु देवता अपना कार्य करते हैं। मेरे भक्त को कोई भयभीत नहीं कर सकता। श्री भगवान के वचन।

    12:50

    इसलिए किसी की ताकत नहीं कि मेरे भक्त का मंगल कर सके। तुम व्यथा चिंता मत करो। ऐ देहधारी केवल तू मेरा नाम जप कर और फिर देख तेरे में कितनी दिव्य शक्ति आ जाती

    13:06

    है। कुछ मत सोच निर्भय रहे। केवल मन लगे या ना लगे जिभ्या से नाम ले। राधा राधा राधा मन लगे ना लगे। कुछ लोगों का प्रश्न रहता है कि यदि मन ना लगे हमारा मन भजन

    13:22

    में नहीं लगता और फिर हम भजन करते हैं तो क्या लाभ मिलेगा तो मन लगे ना लगे जब भोजन पाओगे तो तुम्हारा पेट भर जाएगा कि नहीं भर जाएगा मन लगे ना लगे रास्ता चलोगे तो लक्ष्य प्राप्त हो जाएगा कि नहीं हो जाएगा ऐसे ही मन लगे ना लगे आप राधा राधा बोलोगे

    13:39

    आपको भगवत प्राप्ति निश्चित हो जाएगी आपके दुखों का नाश हो जाएगा अरे प्रीतम तुझे भगवान भगवान कितना प्यार करते हैं तुझे पता नहीं। सच्ची मानिए भगवान ने सबको फ्री वायु दी है। फ्री आकाश अवकाश दिया है।

    13:57

    पृथ्वी में वास दिया है। मानव देह दिया है। जल दिया है। किसका टैक्स है? किसकी फीस लेते हैं भगवान?

    लेकिन आप भगवान का स्मरण नहीं करेंगे तो दुर्गति को प्राप्त हो जाएंगे। अरे प्रीतम

    14:14

    तेरी आकांक्षा पूर्ण करने के लिए मैं समर्थ हूं। तू जो चाहेगा मैं तुझे दूंगा पर तू मेरा नाम जप कर। भगवान कितना प्यार करते हैं जो हमको जिस बात को हम भूले हुए हैं उस बात को समझा रहे हैं।

    14:33

    मैं सदैव तेरे पास रहता हूं। तू जानता नहीं है। कोई ऐसा नहीं जिसके पास भगवान ना हो। क्योंकि सर्वत्र भगवान है तो जहां मैं हूं वहां भगवान है। सबके भगवान है तो मेरे भी भगवान है। सब समय में भगवान है तो जिस

    14:50

    समय मैं जहां हूं उस समय भी भगवान है। सबके भीतर है। हमारे भीतर है। हम कभी एक क्षण भी भगवान से अलग नहीं रहते। पर हम भगवान का चिंतन नहीं करते इसलिए अनुभव नहीं होता। तूने

    15:06

    कामिनी की चाह की स्त्री की तो मैं तेरी स्त्री बनकर तेरे पास बैठ गया। पक्की बात पक्की बात जब सृष्टि नहीं थी तब केवल श्री भगवान थे। जब सृष्टि नहीं रहेगी तो केवल

    15:22

    श्री भगवान रहेंगे तो बीच में जो कुछ है वह सब श्री भगवान ही बने हुए हैं। वेद कहता है एकोहम भविष्यामः मैं एक बहुत रूपों में हो जाऊं ऐसा परमात्मा ने संकल्प किया तो वही परमात्मा स्त्री बन गया पुरुष

    15:38

    बन गया जड़ बन गया चैतन्य बन गया अच्छा बन गया बुरा बन गया भगवान कह रहे हैं ऐ प्रीतम ऐ प्यारे तूने कामना की स्त्री की तो मैं स्त्री बन गया जो जो तू कामना करता है मैं वही पदार्थ बन

    15:55

    जाता हूं वही व्यक्ति बन जाता हूं वही वस्तु बन जाता हूं। इसलिए तुझे कह रहा हूं कब तक तू कामना करता रहेगा मेरे को भूल करके। इसलिए मेरा स्मरण कर और कामनाओं का त्याग कर तो मैं तेरे समीप ही हूं। तुझे

    16:11

    ऐसा अनुभव हो जाएगा। जिस देह से तू ममता करता है इस ढांचे से पंच भौतिक शरीर से तू देह नहीं है चाहे जो कोई कितना विद्वान हो बुद्धिमान

    16:27

    हो कोई 50 वर्ष से शरीर में रह रहा है कोई 40 वर्ष से रह रहा है कोई 30 वर्ष से रहा पूछो तुम अपने को जानते हो बड़े बुद्धिमान बनते हो बड़े ज्ञानी बनते हो अपने को जानते हो तो कहेगा हां जानते मैं अमुक जगह

    16:44

    जन्म लिया हूं। मैं नहीं यह तो देह का परिचय दे रहे हो। यह तो ढांचे का परिचय दे रहे हो। जो तीन हाथ का ढांचा है तुम्हारे हाथ से इसका तुम परिचय दे रहे हो। इसमें जो तुम रह रहे हो वो कौन हो?

    16:59

    उत्तर नहीं है। तुम कौन हो? तो अपना नाम बता देगा। मेरा अमुक नाम। नहीं ये देह का संबोधन है। मैं अमुक रूप रंग का हूं। यह देह का संबोधन है। तुम कौन हो?

    अब चुप हो जाएगा। बस यही बात जान ले तो परमात्म

    17:17

    प्राप्ति हो जाए। भगवान का चिदानंदमय स्वरूप तुम हो। अपने को भूल के पुरुष शरीर में तो पुरुष मान लिया। स्त्री शरीर में तो स्त्री मान लिया। अरे ओ मेरी संतान श्री भगवान कह रहे हैं

    17:33

    इस जड़ दे की ममता से ही तेरा पतन हुआ है। इस शरीर से ममता हटा और मेरे में चित्त को जोड़ तो परिणाम में तू देखेगा कि तू मेरा ही स्वरूप है। सोई जाने जे देह जनाई जानत

    17:50

    तुम होए जाई। अपने सच्चिदानंदम में आत्म स्वरूप का विस्मरण करके तू भोगों में प्रपंच में सब में फस गया और यही फसाव अंतिम समय तेरा चिंतन बनेगा और फिर अगला जन्म उसके परिणाम

    18:07

    से हो जाएगा। इसलिए तू लौट इस ममता और आसक्ति को मेरे चरणों में लगा दे। मेरे नाम का कीर्तन कर। मेरा नाम जप कर। नाम चिंतामणि कृष्ण चैतन्य रस विग्रह

    18:23

    पूर्ण शुद्ध नित्य मुक्तो अभिन्नत मनामनु नाम ही भगवान का चिंतामणि है। जो जितना नाम जप करता है जो चाहेगा वह प्राप्त हो जाएगा। पर नाम पहले पाप का नाश करता है।

    18:40

    यहां की जितनी चाहते हैं सब झूठी है। सच्ची मान लीजिए। एक कामना की पूर्ति होती है, दो समस्याएं खड़ी हो जाती है। दो की पूर्ति होती है। चार समस्याएं कब तक हम लगे रहेंगे इसमें? और इसके बाद मृत्यु आ

    18:56

    जाती है। भारी समस्या सब छूट गया। फिर नई दुकान, नया मकान, नई विद्या, नया ज्ञान कब तक भटकते रहेंगे? अनादि काल से हमारा जन्म होता रहा। हर जन्म में मानते रहे मेरा परिवार है। हर परिवार छूटता रहा। अब हम कम

    19:12

    से कम मानव देह जो मिला है इसे आखिरी कर ले। भजन के द्वारा, भगवत चिंतन के द्वारा हम यह चाह करें कि एक बार तो श्री भगवान को देखें, एक बार तो भगवान का साक्षात्कार करें। पर जीव ऐसा भूला हुआ है कि चाह ही

    19:27

    नहीं है कि भगवान से मिले। तो भगवान का नाम चिंतामणि है। यदि आप लौकिक पदार्थ भी चाहते हो तो वो पुण्य के बल से प्राप्त होते हैं। तो सबसे बड़ा पुण्य है भगवान का नाम। खूब भगवान का नाम जप करो। नाम चैतन्य

    19:45

    रस विग्रह भगवान का चिदानंद स्वरूप नाम है कृष्ण यह कृष्ण चिदानंद में जप कर देखो बड़ा ज्ञान समाया हुआ है जो राम राम नहीं कह पाते थे मरा मरा मरा उल्टा जपे वो ब्रह्म ज्ञानी

    20:02

    हो गए वो भगवान के पावन चरित्र को रचा वाल्मीकि रामायण में अगर हम सीधे राम राम जप रहे हैं राधा राधा जप रहे हैं तो हमें कौन सा ज्ञान नहीं प्राप्त हो जाएगा चैतन्य रस विग्रह पूर्ण शुद्ध

    20:18

    नित्य मुक्तो अभिन्न नामिनो नामी और नाम अभेद है। भगवान और भगवान का नाम अभेद है। अगर हम नाम जप कर रहे हैं तो मानो भगवान कृष्ण ही कृष्ण नाम के रूप से

    20:35

    हमारी जिभ्या में मानो राधा किशोरी ही राधा नाम से हमारी जिभ्या में विराजमान है। ऐ शरीर धारी तू केवल नाम ले। किसी रोग में इतनी बड़ी

    20:51

    सामर्थ्य नहीं कि तुझे परास्त कर सके। सच्ची कहता हूं। अगर भगवान नाम का आश्रय ना हो तो दुर्गति हो जाए। ये नाम की महिमा से तुम्हें कह रहे हैं। कोई भी बड़े से बड़ा रोग उसे

    21:07

    परास्त नहीं कर सकता जो भगवान का नाम जप कर रहा है। जो भगवान की भक्ति से युक्त है। जो भगवान के आश्रय से और शोक चाहे सब कुछ नष्ट हो जाए तो भी भगवान का नाम जप करने वाले के हृदय में शोक नहीं होता।

    21:26

    दुख ज्वाला हमने देखा कि जब हमें अधिक पीड़ा होती है तो किशोरी जो हमें अधिक सुख देती है। इतना आनंद अंदर से दे देती कि बाहर शरीर का दुख हमें पीड़ा नहीं पहुंचा पाता। यदि आप दुख से बचना चाहते हो तो भगवान नाम

    21:44

    का निरंतर रटन करो। नहीं तो ये संसार ऐसा है। इतनी ओवर थिंकिंग बढ़ती चली जाएगी कि आपको डिप्रेशन में पहुंचा देगी। अगर नाम जप नहीं करोगे, सत्कर्म नहीं करोगे, भगवत आराधना नहीं करोगे तो तुम्हारा मन ही

    22:01

    तुम्हें क्लेश देने के लिए उतारू हो जाएगा। तुम्हारा मन ही तुम्हें भयभीत कर देगा। तुम्हारा मन ही तुम्हें गंदी आदतों में फंसाकर तुम्हें नष्ट कर देगा। इसलिए भगवान नाम चाहे वह जो नाम प्रिय हो या

    22:16

    गुरुदेव के द्वारा मिला हो उसे खूब जपिए। जो गति विहीन है जो भोगी है, जो रोगी है, जो परद्रोही है, जिसमें ना ज्ञान है, ना वैराग्य है, ना भक्ति है, जो धर्माचार

    22:33

    शून्य है, यदि वह भी केवल नाम जप करने लगे। कुछ नहीं है अध्यात्म का। शरीर भी पीड़ा युक्त है, मन भी पीड़ा युक्त है। और अगर नाम जप करना शुरू कर दे तो समस्त पीड़ाओं से मुक्त हो जाएगा। देख

    22:50

    लो जप करके। कोई भी रोग, शोक, पाप, ताप, साप उसको व्यापता नहीं है जो भगवान के नाम में रत रहता है। बस नाम जपना कठिन है। मन नहीं लगता नाम जपने में। इसमें रुचि नहीं होती।

    23:07

    अगर हो जाए तो लोक परलोक के सारे सुख तुम्हारे चरणों में रहेंगे और जीवन परमानंदमय हो जाएगा। मृत्यु का भय खत्म हो जाता है। भगवान के भक्त की मृत्यु कैसे होती है? जैसे विशाल गजराज हाथी के गले से

    23:24

    फूलों की माला टूट जाए उसे पता भी ना चले ऐसे भगवान के भक्त की मृत्यु होती नहीं तो जन्मत मरत दुसा दुख होई बड़ा भयानक दुख होता है मृत्यु के समय और मृत्यु आने के पहले न जाने कितने दुख पीड़ा पहुंचाते

    23:39

    हैं। इसलिए सबसे प्रार्थना है जितना बन सके अधिक से अधिक भगवान का मंगलमय नाम जप करो। अरे ओ प्रीतम मेरा नाम बड़ा मीठा है। बस तुम निरंतर लो। नाम मीठा है हमें मीठा

    23:58

    नहीं लगता। तो जैसे पित्त बढ़ जाए तो मिश्री मीठी होती है पर मुंह में डालो तो कड़वी लगेगी क्योंकि पित्त बढ़ रहा है और उसी मिश्री को रोज नियम से खाओ तो पित्त का समन हो जाएगा और मिश्री मीठी लगने

    24:13

    लगेगी। ऐसे ही हमें अविद्या रोग लग गया है। हमारा अज्ञान बढ़ गया है। भोग वासना बढ़ गई है। तो हमें राधा नाम सुधार समसत तुम जो राधा नाम अमृत है अच्छा नहीं लगता।

    24:30

    लेकिन भगवन नाम एकांत शांत बैठकर जप करने में नहीं लगेगा। अगर आप जपने लगो तो अविद्या का नाश हो जाएगा। जैसे मिश्री नियम से पाओ तो पित्त का समन होकर मीठी लगने लगेगी। ऐसे ही भगवन नाम मीठा लगने

    24:47

    लगेगा। जिसको भगवन नाम मीठा लगने लगा मानो भव रोग नष्ट हो चुका है। अब प्रेम उसके हृदय में जागृत होगा और वो सतरति सतरति साम तारति वो स्वयं तर जाएगा। स्वयं तर जाएगा। लोकों को तार देगा। भगवान का भजन

    25:05

    करने वाले में अपार सामर्थ होती है। तुकाराम जी महाराज इसी शरीर से विमान आया। भगवान के विमान में बैठकर भगवत धाम को गए। ये नाम का प्रताप वो इतने नाम प्रेमी थे। हर समय नाम जप करते थे। विट्ठल विट्ठल

    25:22

    विट्ठल महाराष्ट्र में भगवान विट्ठल रूप से विराजमान है। वो जहां चरण रख देते वहां की भूमि बोलती। विट्ठल विट्ठल विट्ठल ऐसा उनका निरंतर नाम जप का प्रभाव था और बड़े चमत्कार नाम जप से वीर शिवाजी महाराज

    25:39

    दर्शन करने के लिए तुकाराम जी के पास गए तो संत दर्शन की एक मर्यादा है कि आप अपने वैभव को ना दिखाएं वहां दैन्य भाव से जाएं तो राजा होते हुए भी शिवाजी ना सिर पर पाग ना चरणों में पादुका हाथ जोड़कर शादी

    25:57

    पोशाक पहनकर और दो अंग रक्षक वो भी गेट में छोड़ दिए। अकेले जाकर तुकाराम जी के चरणों में प्रणाम किया। तुकाराम जी केशव विट्ठल विट्ठल विट्ठल माधव विट्ठल विट्ठल विट्ठल वो कीर्तन में मगन थे।

    26:14

    इतने में मुगल सैनिकों को पता चला कि शिवाजी बिना सैनिकों के तुकाराम जी के पास गए हैं। उन्होंने सोचा बहुत अच्छा अवसर इनको बंदी बना लेने का। गुप्तचर लगे हुए तुरंत सूचना मिली तो जो

    26:30

    अंगरक्षक गेट में खड़े थे वह अंदर गए और कान में लगकर शिवाजी से कहा कि मुगलों को पता चल गया है कि आप यहां आ गए हैं। तुरंत यहां से हट जाइए नहीं तो आपको बंदी बना लेंगे। शिवाजी ने कहा आप बाहर जाओ। तुकाराम जी की तरफ देखा विट्ठल विट्ठल

    26:48

    विट्ठल बैठे रहो और वो भगवन नाम कीर्तन कर रहे। देखो नाम कीर्तन का अमोग प्रभाव मुगल सेना आई पूरी अंगरक्षक तो गुप्त रूप से हो गए वो मंदिर में गए केवल तुकाराम जी ही दिखाई

    27:06

    दिए वहां शिवाजी दिखाई ही नहीं दिए मुगलों की आंखों में शिवाजी दिखाई नहीं दिए सामने बैठे रहे हिले नहीं निर्भय होकर के पूरे मंदिर में ढूंढा जब नहीं मिले तो उनका गलत सूचना मिली और वापस चले गए और वो वैसे ऐसे

    27:22

    ही कीर्तन में बैठे रहे। तुकाराम जी कीर्तन कर रहे हैं। सामने शिवाजी लेकिन कोई मुगल शिवाजी को नहीं देख पा रहे। मुगल सैनिक ये भगवान नाम का अद्भुत चमत्कार जो भगवान नाम का जप करते हैं उनमें अपार

    27:37

    सामर्थ होती है। एक बार कबीर दास जी को जो मुगल सम्राट था उसने बंदी बना लिया। उनकी मां को कुछ विद्वान जनों ने कि तुम्हारा लड़का

    27:54

    देखो राम राम कहता है। उचित होगा कि अपने धर्म का नाम उच्चारण करें। इसलिए तुम बादशाह से यदि कह दो तो वो तुम्हारे धर्म की बात मानेगा। वो बूढ़ी मां उनको समझ में आया कि ठीक बात कह रहे हो। बादशाह से

    28:10

    विद्वानों ने निंदा करके कबीर दास जी के लिए विपरीत भावना भर दी। बंदी बना लिए गए कबीर दास जी। तो इनसे कहा कि तुम इस नाम को छोड़ो। उन्होंने कहा नहीं जो लगन लग गई

    28:26

    अब वो छूटने वाली नहीं। तो उन्होंने कहा इसे हाथी से रौंदा दो। तो कबीर दास जी के दोनों हाथ ऐसे जमीन पर रखकर बांध दिए गए। खूंटे में ऐसे ऐसे गाड़कर रस्सी से ऐसे बांध के और सामने से मत वाला हाथी दौड़ाया

    28:42

    गया। तो हाथी जे ही आता तो बस जब चार कदम दूर रह जाता तो बड़ी जोर से चघार कर वापस लौट जाता। बादशाह ने कहा क्यों हाथी रौंदता क्यों नहीं? महावत से कहा महावत ने कहा कबीर दास की जगह में एक बबर शेर दिखाई

    28:59

    देता है। इसलिए हाथी वापस आ जाता है। बादशाह ने कहा तुम झूठी बात कहते हो। मैं स्वयं चढ़कर देखूंगा। और जब हाथी पर सवार हुए और जेही उनको रौंदने के लिए आगे बढ़ाया तो देखा बबर से तो वापस आते भगवान नरसिं स्वयं वहां प्रकट हो गए अपने नाम

    29:17

    जापक की रक्षा के लिए फिर दूसरी चाल चली कबीर दास जी को जैसे प्रह्लाद जी को होली में दहन किया ऐसे कबीर दास जी को जलाने का प्रयास किया पूरा लकड़ियों का ढेर लगा दिया बीच में कबीर दास जी को विराजमान कर

    29:32

    दिया और आग लगा दी राम राम राम राम राम राम एक भी रूमा नहीं झुलसा पूरी लकड़ियां भस्म हो गई कबीर दास जी की यह कथा हमको पुष्टता प्रदान करती है कि हमें किसी

    29:48

    भी दुख में किसी भी संकट में कोई भी माया के काम क्रोध लोभ फंसा ना सके हम भगवान का नाम जप करें नाम में अपार सामर्थ्य है ओ प्रीतम तेरे सब दुख दूर करने के

    30:04

    मेरा नाम समर्थ है। तू नाम ले केवल चिंता मत कर। मैं तेरे भीतर बाहर सब कुछ देख लूंगा। भगवान कहते हैं भीतर तुम्हारे विकारों को मैं देख लूंगा और बाहर तुम्हारे विरोधियों

    30:20

    को देख लूंगा। तुम केवल मेरा नाम जप करो। कितने कृपालु भगवान हैं। जो संपत्ति शिव राव नहीं दीन दिए दसथ सो संपदा विभूष नहीं सकुच दीन रघुनाथ

    30:38

    मस्तक काट काट करके भगवान शंकर को प्रसन्न करके लंका प्राप्त की थी रावण ने भगवान की शरण में गए तो जाते ही समुद्र का जल लेकर भगवान ने अभिषिक्त कर दिया और लंकेश कहकर विभूषण को संबोधन किया जो संपदा इतनी बड़ी

    30:56

    तपस्या की रावण ने अपने सिर काट के भगवान शिव को दिए वो सब कुछ करके रघुनाथ जी ने विभीषण को दी। ऐसा कृपालु भगवान का स्वभाव है। कह रहे तेरे भीतर बाहर मैं सुख प्रदान करूंगा। तेरे भीतरी शत्रुओं को बाहरी

    31:14

    शत्रुओं को मैं देख लूंगा। जब भगवान कह रहे हैं तो अपने को क्या परेशानी? अपने को तो केवल नाम जप करना है और अपने कर्तव्य कर्म को करना है। आप जो भी कर्तव्य कर्म करते हैं वो भगवान की पूजा हो जाएगी। यदि नाम जप करते हुए करें, भगवान का स्मरण

    31:32

    करते हुए करें, देख तू बीचबीच में मेरे मेरे को देखकर पुलकित हो जाएगा। जब नाम जापक खूब नाम जप करता है तो उसे भगवान के दर्शन होने लगते हैं। वो जिधर देखता है उसे भगवान श्याम

    31:47

    सुंदर मुस्कुराते हुए नजर आते। यह कथा नहीं है। यह जीवन है। आप अपने जीवन को भगवान को समर्पित कीजिए और नाम जप कीजिए। देखिए आपको भगवान का दर्शन होता है कि नहीं। भगवान यही है।

    32:02

    भगवान सब में है। भगवान सब रूपों में है। भगवान सब समय में है। बस केवल आप नाम जप कीजिए। फिर आप देख लेंगे। मेरे सरस स्पर्श से अनुक्षण तू पुलकित रहेगा। तेरी आंखें जगत को नहीं देख

    32:20

    पाएंगी। मेरे को देखेंगी। इसलिए आनंदमय मैं तुझसे सत्य कह रहा हूं। तू केवल मेरा नाम जप कर। अरे अपने को तू भूल गया है। तू मेरा बच्चा है। भगवान कह रहे हैं कि तू मेरा अंश है।

    32:37

    मम वो जीव लोके जीव भूता सनातना मना कष्ट प्रकति मन और पांच ज्ञानेंद्र्रियों के चक्कर में फस के तू अपने को भूल गया। हमारा जो स्वरूप है वह भगवत स्वरूप है। हम

    32:55

    भगवान के अंश हैं। तो चाहे एक चम्मच गंगाजल लो तो गंगाजल, एक टैंकर लो तो गंगाजल। तो गंगाजल गंगाजल है। जैसे ऐसे हम भगवान के अंश है तो भगवान पूर्ण है। तो पूर्ण का अंश पूर्ण ही होता है। हम भगवत

    33:11

    स्वरूप ही हैं। पर पांच ज्ञानेंद्रियां और एक मन यह भोगों में लगने के कारण हम अपने स्वरूप को भूल गए हैं। तू आनंदमय है, परमानंदमय है। लौटो इस संसार

    33:28

    के जंगल से लौटो। मेरी तरफ लौटो। कैसे लौटेंगे? केवल नाम जप से। जितना नाम जप करोगे उतने तुम मुझे अपने सानिध्य में देखोगे। नाम जप नहीं है तो ये माया सामने दिखाई देगी। स्त्री पुत्र धन मकार नाना

    33:45

    प्रकार की भोग सामग्री और इसी में अब ये कर लेंगे तो हम सुखी हो जाएंगे अब यह संग्रह कर लेंगे इतना कमा लेंगे ऐसा कर और ऐसा सोचते सोचते मृत्यु आ जाती है कभी किसी का आज तक काम पूरा नहीं हुआ

    34:01

    काम पूरा तभी माना जाए जब भगवत प्राप्ति हो